जिंदगी हमारी

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जिंदगी हमारी
जिंदगी हमारी

जीना मुमकिन होता अगर तुम साथ होते
शरीर से ही नहीं बल्कि आत्मा से भी पास होते…

वो जिन्दगी है कैसी जिसमें कोई जुस्तजू नहीं है, 
इच्छाएं तो मरने वालों से भी पूछी होगी, 
जिसकी कोई आरज़ू नहीं है….. 

अरमानों की कश्ती से कितने ही पार पाते हैं, 
हम तो ऐसे मुसाफिर हैं जो किनारे पर खड़े होके भी डूब जाते हैं… 

य़ह आँखों की ही तो गुस्ताखियां है जो ख़्वाबों को जगह देती है 
वर्ना जिन्दगी को इतनी फुर्सत कहां, जो ज़ख्मों को तवज्जो देती है….. 

अब आरज़ू का क्या वास्ता है मेरी जिन्दगी से 
जब धड़कनों ने धड़कना ही छोड़ दिया। 
आंखे तो बन्द थी मेरी बस ख़्वाबों ने संवरना छोड़ दिया….. 

तुम ख़ुश हो तो, जिन्दगी के अफ़साने बहुत है
साथ हो न हो, जीने के बहाने बहुत है,
चले थे अकेले, एक टूटी हुई कश्ती पर होके सवार।
मिला न मंजिल मनचाहा, फिर भी जीने के बहाने बहुत हैं…… 

बंदिशों में उलझी हुई मेरी राहें, सुलझने को तरसती है
लफ्जों से सुलझती नहीं, बस निगाहों से बरसती है….. 

तुम्हारे दिये दर्द की भी अपनी एक हस्ती है
वर्ना अधिक ख़ुशी में भी आंखे कहां ठहरती है 
आँसुओं का छलकना खुशी गम दिखाती है 
बस पहचानता वही है जिससे जुस्तजू जुड़ी है…… 

रोज थोड़ा मरती हुं जीने से पहले 
जिन्दगी फिर भी पूछती है जनाजे से पहले
मुस्कुरा दो थोड़ा आँसु बहाने से पहले…… 

आरज़ू थोड़ा सा ठहर जा अभी जुस्तजू बाकी है, 
अभी न खत्म हुई है अरमानों का कारवाँ, 
खुशियों की तलाश की उम्मीदें अभी बाकी है…….


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