आजादी या गुलामी मर्जी हमारी

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आजादी या गुलामी मर्जी हमारी
आजादी या गुलामी मर्जी हमारी

राजनीति का सही मतलब न जाने कहाँ खो गया। राजनीति को वास्तव में हमने क्या बना दिया है। आज की वास्तविकता पर अगर गौर करें तो पता चलेगा कि राजनीती का सही मतलब कोई नहीं समझता न नेता और न ही जनता। हर कोई निजी स्वार्थ को ही राजनीति समझते हैं। 

अगर नेताओं की बात करें तो उनको राजनीति में एक तरह का व्यापार नजर आता है। पहले तो वह हर हाल में इसमें घुस जातें हैं। जी जान से पैसे खर्च करके अपना अपना स्थान सुनिश्चित करते हैं। उसके बाद शुरू से ही इस व्यापार का फायदा उठाने में लग जाते हैं। फायदा जैसे मिले वो चाहे चाटुकारिता से हो या चापलूसी से बस अपना काम निकलना चाहिये। इस तरह के लोग सायद यह भूल गये हैं कि किस तरह से इसी चापलूसी और धोखा धड़ी के कारण से हम इतने ताक़तवर, समृद्ध होने के बावजूद अंग्रेजों ने हम पर 200 सालों तक राज किया था। इनको शायद नहीं पता कि वह  समय कितना भयावह था, किस तरह गुलामों बेसहारों की भांति अपनी अथवा अपनो के जीवन को बत से बत्तर होते हुए देखा था हमने । इतने तकलीफों कष्टों के बाद हम इस गुलामी से आजाद हुए हैं। हमें आजादी से जीने की, शिक्षा पाने की, और तो और मनचाहा रोजगार करने का मौका मिला है। तो हम फिर उसी तरह से इन स्वार्थी नेताओं के चापलूसी बहकावे वाली बातों में फस्ते चले जा रहे हैं। 

मैं सभी नेताओं को दोष नहीं दे रही हूँ। क्योंकि पूरी दुनिया तो स्वार्थी नहीं हो सकती है। किसी के गलत होने अथवा न होने में सामने वाले की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है।सबसे बड़ी दोषी तो हम हैं। हम सामने वाले को हमें छलने का मौका देते हैं तभी तो वह हमें ठगते हैं। नहीं तो आप ही सोचिए आज के समय में जब पूरी दुनिया इतनी तरक्की की और अग्रसर है वहीं पर हमारी स्थिति इतनी दयनीय है क्युं? क्युं हम इतने दुर्भाग्य पूर्ण जीवन जीने को मजबूर हैं? क्युं आज पूरे देश के किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो गये हैं। क्युं हमारी बहू बेटियाँ अपने ही घर में सुरक्षित नहीं है। आखिर क्यूं इतने विकासशील देश में रह कर भी आज चालीस फीसदी लोग अशिक्षित हैं। आखिर इन सबके लिए कब तक हम एक दूसरे पर दोशार्पण करते रहेंगे। कब तक हम अपने फैसलों के लिए दूसरों की झूठी बातों अथवा वायदों पर निर्भर रहेंगे।

अब हमें अपने देश के लिए सोचने की जरूरत है अब हमें इस जाती धर्म से अलग हो कर सिर्फ एक इंसान अथवा हिन्दुस्तानी बनने की जरूरत है। 

यह बात तो सभी जानते हैं कि भारत एक लोकतांत्रिक देश हैं। हिन्दू राष्ट्र होने के बावजूद यहां पर सभी जाती धर्म को समानता दी जाती है। सबकी भावनाओं को यहां बराबर महत्व दिया जाता है। 

पूरे विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जहां सभी धर्मो को सभी लोग एक दूसरे के साथ मिलकर मनाते हैं। हिन्दू ईद भी मनाता है तो मुसलिम दिवाली मिल कर मनाते हैं। तो सभी मिलकर क्रिस्मस और गुरु पर्व का उत्सव का आनन्द उठाते हैं। जब हम धर्मो को मिलकर मनाते हैं। हर उत्सव में शामिल होते हैं सबको अपना परिवार समझते हैं। फिर जब अपना प्रतिनिधि चुनने की बात आती है तो हम कैसे सिर्फ जाती धर्म के आधार पर अपना नेता चुन लेते हैं। अपने देश की सुरक्षा अथवा विकास को सिर्फ अपने जाति धर्म का आधार बना देते हैं। इतने महत्वपूर्ण फैसले के लिए कर्म के बजाय धर्म, विकास के बजाय जाति को चुन लेते हैं। थोड़े से निजि स्वार्थ के लिए पूरे देश को बर्बाद करने को तैयार हो जाते हैं। 

कम से कम अबकी बार अपना नेता चुने तो निजि स्वार्थ के बजाय देश हित का एक बार जरूर ख़याल कर ले। लालच अथवा बहकावे में आकर कोई फैसला न करें। भूत, भविष्य अथवा वर्तमान को ध्यान में रखते हुए करें। क्योंकि देश बढेगा तब ही तो देशवासि बढ़ेंगे। देश सुरक्षित रहेगा तभी तो देशवासी सुरक्षित होंगे।


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