अदालत का खलनायक, क्युं बना जनता का नायक

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अदालत का खलनायक, क्युं बना जनता का नायक
अदालत का खलनायक, क्युं बना जनता का नायक

आज हर राज्य में एक ही काम का आगाज हो रहा है। लोकसभा चुनाव में किस पार्टी को कितना सीट मिलेगा या किस उम्मीदवार को कहां से उतारना है। खैर यह तो फिलहाल हर राज्य की बात है। इसलिए आज हम कुछ ऐसे बातों से अवगत कराने की कोशिश कर रहे हैं जो शायद अपको अपना फैसला लेने में मदद करें। 

आज हम आपको बिहार की राजनीति अथवा वहां के राजनेताओं की छवि से अवगत कराने की छोटी सी कोशिश कर रहे हैं। वैसे तो आज से कुछ साल पहले तक राजनीति की छवि अत्यधिक खराब थी। अधिकांश राजनेता सजायाफ्ता या आपराधिक मामले में फसे हुए रहते थे। आज कई हद तक ऐसे नेताओं को जनता ने नकार दिया है। यह बात तो सही है कि हमे यह तो देख लेना चाहिए कि हम जिसे अपना प्रतिनिधि चुन रहे हैं वह कैसा है अथवा उसकी प्रवृत्ति कैसी है। जिसे अक्सर अदालत खलनायक का दर्जा दे देती है क्युं जनता उसे ही अपना नायक बना लेती है।

ऐसे कुछ चेहरों से आपको अवगत करा दें। इसका श्रेष्ठ उदाहरण शायद लालू प्रसाद यादव है। लेकिन आपको बता दें कि यह नाम न तो पहला है और न ही आखरी। लालू प्रसाद यादव जरुर चारा घोटाले से लेकर और कई घोटालों में फसने के बावजूद पूरे दम से राजनीति में सक्रिय रूप से प्रचार प्रसार किये थे और आज बिहार में तकरीबन सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरे। भले वो स्वयं से चुनाव नहीं लड़ सकते हैं । लेकिन उनका दोष साबित हो जाने के बावजूद उनके दोनों बेटे विधानसभा में जीत दर्ज करा चुके हैं। अथवा वह स्वयं अपने दल के अध्यक्ष भी हैं। ऐसे और भी कई उदाहरण है जो कि किसी न किसी रूप से सजायाफ्ता या आपराधिक छवि के होने पर वो या उनके कोई न कोई रिश्तेदार राजनीति में सक्रिय है। जैसे कुछ नाम यह भी है सांसद पप्पू यादव जो कि सजायाफ्ता होने के कारण चुनाव से वंचित कर दिये गये थे। लेकिन बरी होने के बाद वो चुनाव लड़े भी और जीते भी और आज संसद के सदस्य भी हैं। ऐसे ही कुछ नाम और भी हैं। गोपालपुर के पूर्व सांसद आर के राणा, जहानाबाद के सांसद जगदीश शर्मा, पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ जगन्नाथ मिश्रा और न जाने कौन कौन जो कि स्वयं तो आपराधिक मामले में फसे होने के कारण खुद तो चुनाव नहीं लड़ सकते थे। लेकिन कोई न कोई रिश्तेदार उनकी यह विरासत संभाले हुए हैं। खैर यह तो कुछ गिने चुने प्रतिष्ठित नाम थे। ऐसे न जाने कितने ही लोग होंगे जो सजायाफ्ता अथवा आपराधिक प्रवृत्ति के होने के बावजूद हमारे देश की राजनीति में सक्रिय है।

अक्सर यह देखा गया है कि गरीब अथवा दबंग छवि के लोग संसद या विधान सभा में जाते ही हैं। इस तरह के दबंग या दागी छवि के लोग समाज में अक्सर जमींदार या महाजन के रूप में नायक की भूमिका निभा रहे थे । आज तो बस राजनीति के क्षेत्र में ऐसे लोग उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

ऐसे लोग सिर्फ बिहार में ही नहीं बल्कि पूरे देश में आज फैले हुए हैं। कुछ अपने पूर्वजों की विरासत के रूप में चला रहे हैं तो कुछ अपने दबंगई के दम पर राजनीति में सक्रिय है।

बिहार में 40 लोक सभा सीट है और सभी दलों ने जी जान से अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। अब बस देखना है कि बिहार की जनता ने इन नेताओं में किसके लिए क्या सोचा है। क्योंकि यह बात भी सही है कि बीते कुछ सालों से बिहार में विकास हुआ है। भाजपा और जदयू के गठबंधन से बिहार में काफी बदलाव अथवा सुधार हुआ है।

लेकिन हमारे बिहार में भी एक बात कि समानता बाकी राज्यों की तरह ही है यह भी परिवारिक विरासत के रूप में ही चलती है। अगर जनता थोड़ा सा निजी स्वार्थ को भूलकर या जातिवाद को दर किनार कर के मतदान करे तो शायद बिहार के विकास में रूकावट नहीं आयेगी।

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