अनदेखा

0
4
अनदेखा
अनदेखा

एक शब्द है, “अनदेखा” जो शायद हमारे जीवन का हिस्सा बन गया है। सिर्फ़ किसी खास जगह अथवा मौके पर ही अनदेखी नहीं होती है बल्कि यह हमारे रोज मर्रा के जीवन का हिस्सा बन गया है । जगह जरूरत कैसी भी हो अनदेखी करना हमारी आदत है।

कहीं कोई दुर्घटना हो जाये, अनदेखा कर के चले जाते हैं, और कहते हैं कि कौन परे किसी के झमेले में। कहीं कोई अपराध हो रहा हो अनदेखा कर के निकलो वहां से, बीच बचाव करने की कोई आवश्यकता नहीं है। कोई कुछ गलत करता हो अनदेखा कर दो,कहीं कोई गंदगी फ़ैली है अनदेखी करके निकल जाओ , कोई घूस लेता हो अनदेखा कर दिया। कोई भी घटना हो वह चाहे घर में हो या बाहर,किसी सरकारी विभाग में हो या निजी संस्थानों में, घटना किसी बच्चे से जुड़ी हो या बहु बेटियों से जब तक घटना दुर्घटना में न बदल जाए तब तक अनदेखी करना हमारी आदत का हिस्सा  है।

जब समय हमारे हाथों से निकल जाता है। घटना किसी बड़े दुर्घटना का रूप ले लेता है , तब हमारी नींद खुलती हैं और हम मोमबत्तियां लेकर सड़क चौराहे पर प्रदर्शन शुरू कर देते हैं। सरकारी विभागों, नेताओं, सरकारी संपत्तियों इन सबका पुर जोड़ विरोध प्रदर्शन शुरू करने लगते हैं। अपना आक्रोश हम सरकारी सम्पत्तियों अथवा निर्दोषों पर निकालते हैं। मानो उस समय ऐसा लगता है जैसे कि आज समाज और सरकार दोनों ही जाग जाएंगे अथवा दुबारा अब कोई भी ऐसी दुर्घटना नहीं घटेगी।

जैसे कि मुजफ्फरपुर में उन गरीब बच्चों के जीवन के साथ हुआ। सभी जानते थे कि बिहार की चिकित्सा व्यवस्था कैसी है। यहां डाक्टर की क्या स्थिति है। अगर सच्चाई जाननी है तो आज भी बिहार के उन गांवों में जाके देखिये जहां हस्पताल तो है लेकिन वहां की स्थिति कैसी है न जरूरत के मुताबिक किसी भी तरह की चिकित्सा सामग्री, न ही मरीज़ों के मुताबिक नर्सें ना ही जरूरत के अनुसार डाक्टर। बड़ी बीमारियों का इलाज तो बहुत दूर कि बात है छोटे मोटे संक्रमण का भी इलाज नहीं हो पाता है। 

वास्तव में गरीबी अपने आप में एक बीमारी है। जिनके पास न तो खाने की व्यवस्था है न पहनने की। छोटे छोटे बच्चे घरों दुकानों में काम करते हैं कुछ तो कचरा चुन के अपना गुजारा करते हैं। ऐसे में उन्हें जो कुछ खाने पीने को मिलता है वही खा पी लेते हैं। वह वस्तु वास्तव में खाने लायक है भी की नहीं य़ह भी उन्हें नहीं पता। बस भुख लगी तो खा लिया। ऐसी स्थिति में लीची आम जैसे गर्म फल जब बगीचों में निगरानी के दौरान उन्हें खाने को मिलता है तो य़ह बच्चे उन फलों को खाली पेट में खा लेते हैं एक तो इनको पचाने में असमर्थ होतें है ठीक से इनका टीकाकरण भी नहीं हुआ होता है मौसम भी इन फलों के विपरित होता है जिस कारण से इनकी स्थिति इतनी भयावह हो जाती है। 

वैसे तो देश के हर ग्रामीण क्षेत्रों की लगभग ऐसी ही स्थिति होती है,कहीं दिक्कतें अधिक मात्रा में सामने आती है तो कहीं छोटे मोटे हादसे का रुप लेकर अनदेखा कर दिया जाता है।

जरूरत है थोड़ी जागरूकता की। यदि हम सही मायने में इन मामलों का समाधान चाहते हैं तो किसी भी कुव्यवस्था को अनदेखा नहीं करने का प्रयास करना पड़ेगा। जब जहां भी ऐसी स्थिति अथवा कोई व्यक्ति जो जरूरतमंद लगे वह चाहे किसी भी अवस्था में क्युं न हो क्युं न वह झूठ ही बोल रहा हो उसकी मदद अगर हम कर सकते हैं, तो उसे अपने जीवन की प्राथमिकता में शामिल करें। तबही हमें प्रदर्शन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और हम एक स्वस्थ अथवा समृद्ध समाज की स्थापना कर पायेंगे। तब शायद हमें ऐसी दुःखद घटनाओं से छुटकारा मिलेगी।


Follow @India71_

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here