अपनी गति दुर्गति अपने हाथ

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अपनी गति दुर्गति अपने हाथ
अपनी गति दुर्गति अपने हाथ

आज हम बात कर रहे हैं हमारे देश के देशवासियों की स्वभाव और स्थिति के बारे में। यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि पहले तो हम अपने अथवा अपनो की सुख सुविधाओं के लिए हंगामा करते हैं। और जब हमें कई तरह के सुख सुविधाएं उपलब्ध होती है तो हम उसको हजम ही नहीं कर पाते।

जैसा कि घर घर में बिजली पहुंचता है तो हम बिजली चोरी करने लगते हैं। ट्रेनों में अगर हमारी सुविधाओं के लिए हर तरह के सामग्री की व्यवस्था की जाती है तो हम उन सामानों की चोरी करने लगते हैं या फिर उन सुविधाओं को नष्ट कर देते हैं। सरकारी चीजों को अपनी नहीं दूसरों की वस्तु समझ कर बरबाद कर देते हैं। सड़क, रेलवे ट्रैक, ब्रिज इन जगहों को तो मानो हमने घूमने फिरने की जगह बना दिया है। और आज कल सेल्फी की धूम मची है जिसे देखो अथवा जहाँ देखो बस एक ही जूनून सेल्फी लेनी है। वो चाहे हाइवे हो या या कोई गहरी नदी। पहाड़ की चोटी हो या कोई गहरी खायी, न जान का डर, न किसी की कोई परवाह, बस किसी तरह सेल्फी लेनी है। और जब इस दौरान कोई अनहोनी हो जाये तो अपनी कोई गलती नहीं सारी की सारी गलती सरकार और सिस्टम की। 

हाल ही में घटी अमृतसर की रेल दुर्घटना जो सही मायने में दिल दहलाने वाली है। लेकिन आप ही बताइए कि जो रेलवे ट्रैक हर-समय रेल के आने जाने के लिए व्यस्त हो। उस रेलवे ट्रैक पर लोगों का बिना सोचे समझे वहां रुकना जायज था। यह हमारी गलती नहीं है कि हमने इन जगहों को व्यक्तिगत तौर पर इस्तेमाल करना अपनी आदत में शामिल कर लिया है। आखिरकार उन 60 लोगों के मौत के जिम्मेदार कौन है। हमारी गलत आदत या सरकार। कब तक हम अपनी गलतियों के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराएंगे। 

आज तकरीबन 35 लाख लोग हर साल किसी न किसी तरह के हादसे का शिकार हो जाते हैं जिनमें से अधिकांश मामलों में हादसे की जिम्मेदारी पीड़ित की ही होती है लेकिन हम फिर भी नहीं सुधरते। और बिना किसी सीख के एक ही गलती को ताउम्र दोहराते रहते हैं। 

“जिन्दगी हमारी अनमोल मोती,

जिसको बचाना जिम्मेदारी हमारी |

बस एक गलती, मिली गहरी खायी,

खो गई मोती बस रह गई तन्हाई ||”


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