अपराधी कौन धर्म या इन्सान

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अपराधी कौन धर्म या इन्सान
अपराधी कौन धर्म या इन्सान

कदाचित य़ह सोच सही नहीं है कि हम किसी भी धर्म में भेदभाव करें। लेकिन जब अपने चारों तरफ के हालात पर नजर डालते हैं तो मन मजबूर हो जाता है य़ह मानने को की धर्म इन्सान के सोच अथवा कर्म का आइना है। 

आजकल अक्सर यह देखने को मिलता है कि अगर कहीं कोई अपराध हुआ तो वह अपराध करने वाला व्यक्ति कौन है, हिन्दू अथवा मुस्लिम? हमारी सोच अक्सर धर्म पर ही क्युं स्थिर है? अपराध यदि हिन्दू के साथ हुआ है तो यकीनन अपराधी मुस्लिम है। वहीं पीड़ित व्यक्ति मुस्लिम है तो अपराधी हिन्दू है। उसके बाद शुरु हो जाता है – प्रदर्शन, आंदोलन, आगजनी, खून खराबा। 

कुछ समय पहले एक मैसेज पढ़ा जिसमें लिखा था कि “हर मुस्लिम आतंकवादी नहीं होता लेकिन हर आतंकवादी मुस्लिम ही होते हैं।” यह बात भी सही है कि हिन्दू से अधिक मुस्लिम अपराधिक मानसिकता वाले होते हैं। अक्सर हमने देखा है कि उनकी सोच ही क्रूरता भरी होती है। वे हमेशा सामने वाले का दमन करना चाहते हैं। उन पर शासन करना चाहते हैं, उनको दबाना अपनी बात हमेशा ऊपर रखना। छोटी छोटी बातों पर कलह करना, औरतों के मामले में तो अत्यन्त ही कठोर प्रवृति के होते हैं छोटी छोटी बातों पर तलाक देना, एक के होते हुए दूसरी फिर तीसरी कई बार चौथी पांचवी निकाह करते रहना। औरतों को अपने मनोरंजन का साधन समझ कर उन पर यातनाएं करना। छोटी उम्र में निकाह कर देना, औरतों को हमेशा पर्दे में रखना। उनके यहां तो मौलवी भी औरतों को शोषित तथा प्रताड़ित किया करते हैं हलाला के नाम पर। कभी तलाक कभी हलाला कभी बुरखा इन्हीं सब में औरतों को उलझाए रखते हैं। आगे बढने का मौका ही नहीं देते। अगर भुले बिसरे कभी कोई इसके खिलाफ आवाज उठाता भी है तो पुरी मुस्लिम समुदाय उसके विपरित खरी हो जाती है, औरतों के हक़ को दबाने के लिए।

मुस्लिम जब अपने ही लोगों की सुरक्षा या आज़ादी नहीं चाहते तो ऐसे लोग किसी समाज या दूसरे जाति के लोगों की सुरक्षा या मदद कैसे कर सकते हैं।

हमने अक्सर देखा है कि मदरसे के नाम पर बच्चों को कट्टर मुस्लिम बनाया जाता है। बचपन से ही वे लोग धर्म के नाम पर एक दूसरे को बांटने का काम करते हैं।

आज पूरे दुनियां में जहां कहीं भी कोई आतंकवादी हमला होता है तो अधिकांश हमले मुस्लिमों के द्वारा ही अंजाम दिया जाता है। और भारत एक मात्र देश है जहां जितने भी आतंकवादी हमले हुए हैं सारे के सारे मुस्लिमों के द्वारा ही हुए हैं। 

साधारण सी बात है पूरे देश में ऐसा कोई परिवार नहीं है। जो की अमीर हो या गरीब, या किसी भी धर्म को मानने वाले क्युं न हो जब विश्वास करने की बारी आएगी तो वह किसी भी धर्म पर विश्वास कर लेंगे लेकिन मुसलमानों पर किसी भी सूरत में नहीं करेंगे। किसी एक की गलती के कारण मुसलमानों की य़ह स्थिति नहीं है दुनियां में बल्कि आए दिन घटने वाली घटनाओं को देखते हुए यह स्थिति बनी है। कभी पत्थरबाज के रूप में, कभी आतंकवादी के रूप में, कभी देश के भीतर बड़े बड़े पदवी पर बैठे देश को खोखला बनाने के रूप में, जब भी देश पर विपदा आयी है तो कहीं न कहीं दुःखों का कारण मुस्लिम ही बने हैं। 

आज भी समय है अपने आप को सही साबित करने अथवा बदलने का। शुरुआत अपने ही घर से कर सकते हैं। औरतों के सम्मान की लडाई में अपना योगदान देकर। बुर्का अथवा तीन तलाक के मामले में सरकार को अपना सहयोग दें। अथवा औरतों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार दें। इस तरह से अपने आप ही आपके अन्दर से कट्टर वादी सोच समाप्त हो जाएगी। 

इज्ज़त दो इज्ज़त लो, आजाद रहो आज़ादी से जीने दो इंसानियत इसी को कहते हैं।


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