अयोध्या में राम मंदिर निर्माण – चुनाव 2019

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अयोध्या में राम मंदिर निर्माण - चुनाव 2019
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण - चुनाव 2019

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा संत एवं रास्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लोगों द्वारा उठाया जा रहा | वैसे यह मुद्दा वर्षों से या कहें तो सदियों से चला आ रहा है | लकिन 2019 के संसदीय चुनाव के मद्देनज़र यह एक गम्भीर विषय बन गया है | इस मुद्दे पर जनता भी जागरूक हो गई है | सबों की नज़र सरकार पर ही है | राम मंदिर निर्माण के समर्थकों का कहना है कि मंदिर आज नहीं बनेगा तो कब बनेगा | विपक्षी पार्टियों का बड़ा गुट इस मुद्दे पर चुप बैठी है | भाजपा के लोग इस मुद्दे पर बड़ी सावधानी से बोल रहें हैं | उनका कहना है की मामला सुप्रीम कोर्ट में है वहाँ के निर्णय आने के बाद ही सही फैसला सरकार लेगी | इससे आगे भी वो बोलते हैं की ‘मंदिर वहीँ बनेगा जहाँ अभी रामलला विराजमान है और भाजपा ही मंदिर का निर्माण करेगी” इसमें दो राय नहीं है | भाजपा के कथन में यहाँ विरोधाभास नज़र आता है | एक तरफ वो कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रही है तो दूसरी तरफ वो निर्माण का आश्वासन भी दे रही है |

ऐसी सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट 04 जनवरी 2019 को अयोध्या केस की सुनवाई करेगा और उसी दिन मामले की सुनवाई के लिये जजों के एक बेंच का गठन किया जायेगा | बेंच कब से सुनवाई करेगा और कब तक सुनवाई चलती रहेगी, फैसला कब आएगा ये तो आने वाला कल ही बतायेगा | मगर इतना तो जरुर है कि फैसला 2 महीने के अन्दर नहीं आने वाला है | चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने के बाद चुनाव आचार संहिता लागू हो जायेगी | तो सरकार कोई नीतिगत फैसला नहीं ले सकती है | सभी परिस्थितियों को एक साथ जोड़कर देखा जाय तो लगता नहीं कि कोर्ट के निर्णय के बाद सरकार चुनाव से पहले मंदिर निर्माण के पक्ष या विपक्ष में कोई कदम उठा सकेगी |

अब प्रश्न उठता है की चुनाव से पहले अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कार्य प्रारम्भ नहीं हुआ तो निर्माण के पक्षधारी अतिउत्साहित मतदाता का मत किधर जायेगा | चुप्पी साधे कांग्रेस एवं उसके सहयोगी दल इस परिस्थिति का लाभ उठा सकेगें या मजबूरी में पुनः भाजपा के नारे “मंदिर हम ही बनायेंगे” के साथ जायेंगे | वर्तमान में मंदिर निर्माण विरोधी मतदाता कांग्रेस के साथ खड़े दिखाई दे रहें हैं | शेष मतदाताओं में से भाजपा अपने कार्यकर्ताओं के साथ चल रही है | बाकी बचे मतदाताओं के मन में जो भी खिचड़ी पक रही हो इतना तो स्पष्ट है वे भाजपा से रुष्ट होंगे | वर्तमान सरकार की जो भी उपलब्धियाँ हों वो आस्था के सामने गौण हो जायेगी या आस्था ही हावी रहेगी | अगर आस्था हावी रहती है फिर कांग्रेस उसे अपनी ओर मोड़ सकेगी ? ऐसे मतदाता उस कांग्रेस पर क्या विश्वास करेगा जो मंदिर निर्माण विरोधियों के साथ खड़ी है | ऐसे मतदाताओं को अपनी ओर लाने में क्या कांग्रेस  नेतृत्व सक्षम है ?

कांग्रेस नेतृत्व यह कहकर सामने आती है कि हमारे पूर्वजों ने अयोध्या में मंदिर निर्माण के पक्ष में आजतक की परिस्थिति को लाने में सक्षम हुए हैं और इस चुनाव के बाद विवादित स्थल पर जो भी निर्माण कार्य शेष है उसे हम पूरा करेंगे, तो हो सकता है कि भाजपा से रुष्ट मतदाताओं की नीयत डगमगाने लगे और सम्भव है कि उनका एक बड़ा वर्ग कांग्रेस के पक्ष में चला जाय | लकिन इसके लिये कांग्रेस नेतृत्व को काफी मसक्कत करनी पड़ेगी क्योंकि भाजपा सरकार की ढेर सारी उपलब्धियों को ‘आस्था’ से दबाना होगा साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि मंदिर निर्माण विरोधी मतदाताओं की भावनाओं को भी चोट न लगे | तो क्या इन परिस्थितियों में भाजपा हाथ पर हाथ रखकर चुपचाप बैठी रहेगी ? उसके पास क्या विकल्प होंगे कैसे वो कांग्रेस का प्रतिकार करेगी ? हाँ, भाजपा मंदिर का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में लटकाने का ठीकरा कांग्रेस पर फोड़ेगी तथा उसका कहना होगा कि आज कांग्रेस का अयोध्या मामले में यह समर्थन खोखला है | यदि यही बात वो पहले कही रहती तो निर्माण कार्य प्रारम्भ ही नहीं समापन की ओर  रहता | यदि कांग्रेस के दिल में मंदिर निर्माण के प्रति रूचि है तो वो कोर्ट में शपथ पत्र दें कि पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहाराव के  समय में जो शपथ पत्र कोर्ट में दिया गया था उसपर कांग्रेस पार्टी की सहमति है तथा दो दिनों का संसद का विशेष सत्र बुलाने का राष्ट्रपति जी से आग्रह करे | इससे मतदाताओं के मन का द्वन्द समाप्त हो सकता है और मतदाता भी स्वतंत्र हो जायेगें | इसके लिये भाजपा को नीचे स्तर से लेकर ऊपर तक , गाँव से लेकर गली तक के मतदाताओं से संपर्क साधना होगा | 2019  का चुनाव राम मंदिर के मुद्दे को लेकर भाजपा के लिये चुनौती है | कांग्रेस की चुप्पी इस मुद्दे पर छद्म है | भाजपा को इसे बारीकी से समझना होगा और कांग्रेस की चुप्पी को यदि वह किसी भी रूप से तोड़ देती है तो भाजपा को काफी लाभ होगा | दोनों पार्टियों को यह समझना होगा की ‘आस्थाभारत जैसे देश में कमजोर मुद्दा नहीं है |


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