बच्चों की मनोस्थिति के प्रति जागरूक और सतर्क रहें!

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बच्चों की मनोस्थिति के प्रति जागरूक और सतर्क रहें!
बच्चों की मनोस्थिति के प्रति जागरूक और सतर्क रहें!

आज बच्चों में बढ़ रही अपराध और आत्महत्या की भावनाओं को देख कर मन बहुत चिन्तित हो गया है। यह भी सच है कि बच्चों के द्वारा होने अथवा किए जाने वाले गलतियों में कहीं न कहीं परिवार के बड़े भी जिम्मेदार होते हैं। 

आज की घटना को देख कर मुझे पूर्ण रूप से विस्वास हो गया कि गलती सिर्फ बच्चों की नहीं। बल्कि कहीं न कहीं हमारी परवरीस की भी है।

आज सुबह ही यह दुखद समाचार मिला कि एक मित्र के पुत्र ने जिसकि उम्र मात्र से 18 वर्ष की थी, उसने अपने माता पिता के विचार के विपरीत न जा सकने के कारण आत्महत्या कर ली। अभी हाल ही में माता पिता अपने दोनों बच्चों के साथ दिल्ली शहर में रहने आये थे। दोनों बच्चे बहुत ही समझदार और ते‍हजीव वाले थे। दोनों अच्छे स्कूल में पढ़ते थे अच्छे माहोल में उठना बैठना था। फिर क्या हुआ की इतनी कम उम्र में इतना बड़ा फैसला कर लिया।तब सुनने में आया कि यह मामला प्रेमप्रसंग से जुड़ा था। माता पिता के द्वारा सही मार्गदर्शन न मिलने के कारण, उसने बिना सोचे समझे सिर्फ झुंझलाहट में आकर इतना बड़ा कदम उठा लिया। इन हीं सब से बचने के लिए तो वह अपने बच्चों को लेकर  दूसरे शहर रहने चले आये थे। शहर बदलने के बजाय विचार बदले होते तो शायद उन्हें यह दिन नहीं देखना पड़ता।

यह कोई पहला मामला नहीं है कि किसी ने ऐसा कोई कदम उठाया हो। आये दिन हमें इस तरह के मामले सुनने को मिलते ही रहते हैं। हम अक्सर देखते अथवा सुनते ही हैं कि कभी किसी बच्चे ने कम नंबर आने के कारण आत्महत्या कर ली, तो कभी परिवार के अधिक दबाव में आकर, कभी प्रेमप्रसंग के मामले में अधिक जोड़ जबरदस्ती के कारण, तो कभी मन चाहा काम न कर पाने के कारण, कभी कीसी भुल को छुपाने की कोशिश में तो कभी सरमीन्दगी की बजह से आत्महत्या कर लेते हैं। यह हमारी कैसी विडंबना है आज कल के बच्चों ने यह कौन सी नई राह चुन ली है। 

अगर हम दो तीन दसक पीछे देखते हैं तो हमें ऐसे अपराध कहां देखने को मिलता था । यद्यपि हम पहले से अधिक जागरूक भी हुऐ हैं हमारे ज्ञान का दायरा बढ़ा है। पहले से कहीं अधिक समृद्ध और प्रतिभाशाली हुए हैं। फिर हम कहां पर गलत हो गये हैं, हमसे अपने बच्चों की परवरिश में कहां चुक हो रही है। 

इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए मुझे लगता है कि शायद हमारे अन्दर प्रतियोगिता की भावना अत्यधिक बढ़ गई हैं। हम हमेशा अपने बच्चों को अपने जैसा अथवा दूसरों के जैसा बनाने में लगे रहते हैं। यह मत करो वह मत करो उसके जैसा पढ़ो, वैसा बनो में जो चाहता हूं वही करो वगैरह वगैरह। ऐसी स्थिति में क्या उन के पास कोई और विकल्प हमने छोड़ा है। ऐसे में उन बच्चों के पास और भी कोई विकल्प बचा है। या तो वह हमारे विपरीत काम करेंगे, या घर छोड़ देंगे या वही करेंगे जो न चाहते हुए भी हमें सुनना पड़ता है।

ऐसे में बदलाव की आवश्यकता किसे है हमें या उन्हें। मैं यह नहीं कहतीं की बच्चों से हमें कोई आशाएँ या उम्मीदें नहीं रखनी चाहिए, लेकिन कीसी को अपने रंग में रंगने के लिए शुरू से ही कोशिश करनी चाहिए। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम बच्चों से क्या चाहते हैं और किस तरह से कराते हैं।

यह तो आपने भी सुना ही होगा कि कोई भी अकृति जब हम बनाते हैं तो वह गीली मिट्टी से बनाते हैं सूखी या पकी हुई मिट्टी पर नहीं। हम यह भी जानते हैं और मानते भी हैं कि अगर किसी भी एक काम पर पूरा ध्यान दिया जाय तो बाकी सभी काम धुंधली पर जाति हैं। उसी तरह से अगर हम भी अपने बच्चों को कम उम्र में ही उसे कीसी भी एक रास्ते पर चलने या अपना पूरा ध्यान लगाना सिखाएँगे तो धीरे धीरे उसका पूरा व्यक्तित्व उसी मंजिल पर निर्धारित हो जाएगा वह उसके बाद इधर उधर की बातें सोचने या समझने की कोशिश ही नहीं करेगा। क्यूंकि उसे अपने उसी काम को अपना जीवन का लक्ष्य मान लेगा।

आपने देखा होगा कितने बच्चों को चित्रकारी का सौख होता है बचपन से ही तो उसका वैसा ही माहोल बनाये, कोई किसी खेल कूद में माहिर हो तो उसे वैसा ही माहोल दें। कोई पढ़ायी में कुछ करना चाहे तो उसे उसी में अपना सहयोग दें। कहने का तात्पर्य है कि ईश्वर हर इंसान को कोई न कोई खास गुण देते हैं जो उसे अपने आप में खास बनाता है। अथवा अगर कभी किसी बच्चे में ऐसा कोई हुनर न दिखे तो उस गीली मिट्टी को आप अपने मन चाही आकृति दे दें।

मिलाजुला कर कहने का तात्पर्य यह है कि आज हमारे पास बहुत से साधन है जिससे हम अपने बच्चों को भटकने से रोक सकते हैं उनका उनके ही नजरिए से उनको बदला जा सकता है। बस हमे थोड़ी सी समझदारी और दोस्ताना स्वाभाव की आवश्यकता है।

मुझे पूरा विश्वास है हमारी ऐसी परवरिस हो जाए, फिर तो शायद ही कोई बच्चा घर या दुनियां छोड़ने की सोचेगा। स्वयं जागरूक बने अपने बच्चों को जागरूक बनाएं। उन्हें बताएं जिंदगी जीने के लिए मिली है, गवाने के लिए नहीं।

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