बदलते रिश्ते का सच !

0
5
बदलते रिश्ते का सच !
बदलते रिश्ते का सच !

आज महिलायें पुरूष के समकक्ष खड़ी है | नौकरी व्यापार  सिनेमा से लेकर राजनीति तक में वो बराबरी पर है | आपसी प्रतिस्पर्धा में वो पुरुषों से पीछे नहीं रह गई है | देश की सामाजिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्था बदलाव की ओर जा रही है | पहले महिला और पुरूष का सम्बन्ध पत्नी-पुरूष का होता था | और पत्नी का दूसरा रूप अर्द्धांगिनी कहा जाता था | आज मान्यतायें बदल गई है | ब्यॉय फ्रेंड-गर्ल फ्रेंड, लिभ-इन-रिलेसन, सम-लैंगिक सम्बन्ध आदि मान्यता प्राप्त सम्बन्ध पति – पत्नी के बीच आ गये हैं | यहाँ तक कि व्यभिचार करने बाले अब अपराधी नहीं माने जायेंगे (आईपीसी की धारा 497 पर सुप्रीम कोर्ट) | इस तरह सम्बन्धों की पवित्रता का कोई मायने नहीं रह गया है | अकेला जीवन जीने की भावना का उत्पन्न होना भी चिन्तनीय है | स्त्री पुरूष अब एक दुसरे के पूरक नहीं रह गये हैं | दोनों के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा विद्वेष में बदलता जा रहा है | प्रतिस्पर्धा में पुरूष अपने पुरुषत्व के दंभ के कारण पीछे पड़ रहे हैं | वे हीन भावना के शिकार हो रहे हैं | अस्थिरता के इस माहौल में जहाँ जिसे अवसर मिलता है बिना उसके परिणाम पर विचार किये उसका अनुचित लाभ लेने का प्रयास करता है | महिलायें भी इसमें पीछे नहीं हैं | आज तृतीये पीढ़ी के लड़के एवं लड़कियों की मानसिकता सातवें आसमान पर है | उनके खानपान पहनावे और घूमने फिरने में कोई रोक टोक नहीं है | उनके माता पिता भी उनसे इस बारे में पूछने के अधिकार से वंचित होते दिख रहे हैं | लड़कियों में ऊंचाईयों को छूने की ललक दूध की ऊफान की तरह होती है मगर हलका फर्क है, आँच के कम होते हीं दूध की ऊफान तुरत बैठ जाती है उनका बिना दुर्घटना के नहीं | भौतिकवाद के बढ़ते कदम ने हर की मानसिकता को भ्रष्ट कर दिया है | रंगीन परदे में बढ़ते रोजगार के आकर्षण भी इस तरह की सोच को बढ़ावा दे रहे हैं |

बाहरी सुरक्षा की कमान सँभालते रहने के साथ आतंरिक प्रशासनिक व्यवस्था में भी बराबरी की भागीदारी रखने बाली महिला फिर पुरूष के आगे कमजोर क्यों पड़ जाती है | यहाँ यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि पहले की अपेक्षा महिलाओं में आत्मविश्वास और आत्मबल बढ़ा है फलत: अकेली महिला से जोर जबरदस्ती के लिये पुरुषों को गैंग बनाने की जरूरत पड़ गई है | स्त्री और पुरूष दोनों की सोच में थोड़ा सा अन्तर है | अभी भी महिलाओं में सामाजिक उपहास का भय थोड़ा बचा हुआ है जबकि पुरूष इस सबसे ऊपर जा चुका है, उनमें भय या संकोच नाम की कोई चीज नहीं रह गई है | रेप के बाद पीड़िता अपने को कमजोर महसूस करती है जबकि पुरूष दंभ भरते हैं | पीड़िता सामाजिक उपहास का सामना करने से बचना चाहती है तो पुरूष को समाज का भय है ही नहीं | बर्तमान सन्दर्भ में यह दोनों की कमजोर मानसिकता का द्योतक है | यहाँ यह भी सच है कि जिसको समाज का डर नहीं उसे कानून का भी डर नहीं होता | इस आलोक में महिलाओं को चाहे वो रेप पीड़िता हीं क्यों न हों पुरुषों की तरह समाज से मुकाबला करना चाहिये | जिस दिन ये सोच महिलाओं में जागृत होगा उस दिन सही मायने में वो उस दिन बराबरी कर पाएंगे | कानून भी उस परिपेक्ष में संशोधित हो जायेंगे क्योकि सामाजिक मान्यताएं, परम्पराएँ एवं व्यवस्थाओं के आधार पर हीं वो बनते बदलते रहते हैं |

मैं ये नहीं कह सकता कि किसी को भी कानून को अपने हाथ में ले लेना चाहिये | लेकिन मैं ये जरुर कहना चाहूँगा कि छोटी उम्र बालों में सिखने की ललक होती है | खासकर दृश्य चित्रों से उनकी मानसिकता पर गहरा प्रभाव पड़ता है | सिनेमा और टीवी में अश्लील चित्रों एवं स्टंटों का प्रसारण उनकी मानसिकता को विकृत करने में अहम् भूमिका निभाती है | आये दिन घटनाओं-दुर्घटनाओं के घिनौने तस्वीर ख़बरों में छाये रहते हैं | समाज और सरकार दोनों हीं चिंतित हैं | लेकिन समाज की भूमिका इन मामलों में अहम् है जिसकी जिम्मेदारी उसे लेना होगा | बच्चों की बढ़ती उम्र के साथ माता पिता की जागरूकता परिहार्य है | उन्हें इसका ध्यान रखना होगा |

Follow @India71_

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here