बाढ़ क्या और क्यूँ ! समस्या तो समाधान भी है !

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बाढ़ क्या और क्यूँ ! समस्या तो समाधान भी है !
बाढ़ क्या और क्यूँ ! समस्या तो समाधान भी है !

बाढ़ एक प्राकृतिक समस्या है | अत्यधिक वर्षा ही इसका एक कारण है | इससे जान माल की काफी क्षति हो जाती है | मौसम विभाग द्वारा अत्यधिक वर्षा की चेतावनी भी दी जाती है तब भी लोग सतर्क हो जाय ऐसा नहीं कर पाते हैं | अत्यधिक वर्षा के पानी से नदी नाले भर जाते हैं और पानी अपनी सीमाओं को लाँघते हुए दोनों ओर की जमीन पर फैलना शुरू कर देते हैं | खेत खलिहान को डुबोते हुए आवासीय क्षेत्रों में प्रवेश कर जाते हैं और लोग परेशान हो जाते हैं |

रिहायसी इलाके का पानी नदी नाले में जाता है | अगर नाले की व्यवस्था सही नहीं रहती है तो नदी में जाने के बजाय लोगों के घर में पानी प्रवेश करने लगता है | इस तरह नाला के अवरूद्ध होने के कारण बिना बाढ़ के भी बाढ़ आ जाती है | कभी-कभी ऐसा भी देखा गया है कि नदी के एक तरफ के लोग अपने को बचाने के लिये नदी के दूसरे ओर के तटबन्ध को काट देते हैं | इससे दूसरी तरफ पानी का बहाव हो जाता है और लोग मुश्किल में पड़ जाते हैं | जान माल का खतरा हो जाता है |

बाढ़ से बचने के लिये जरुरी है कि लोग वर्षा का समय आने से पहले घर में जरुरी खाने पीने का सामान का इन्तजाम कर लें | हर तरफ से सतर्क रहें | बाढ़ शत प्रतिशत प्राकृतिक आपदा नहीं है | प्राकृतिक आपदा सुचना देकर नहीं आता है | बाढ़ आने की सम्भावनाओं का समय निश्चित है और मौसम विभाग द्वारा समय-समय पर अत्यधिक बारिस होने की सम्भावनाओं की सूचना भी दे दी जाती है | बाढ़ की स्थिति से निपटने के लिये सरकार और आम लोगों को सतर्क रहना कोई मुश्किल काम नहीं है | सब कुछ के लिये सरकार पर निर्भर रहना अच्छी बात नहीं है | सरकारी एजेंसियाँ या कोई तीसरा आपकी मदद के लिये तभी पहुँचेगा जब आप पानी से बुरी तरह घिर जाते हैं |

अपनी सुरक्षा के लिये हमें यह ध्यान देना होगा कि हमारे अगल-बगल जो नाले हैं उनकी साफ़-सफ़ाई हो रही है या नहीं | नाले के द्वारा हमारे इर्द गिर्द का पानी नदी में जाता है | अगर वो बहता नाला है तो हम ज्यादा नुकसानी में नहीं पड़ सकते हैं अन्यथा बारिस के समय वही नाला हमारे परेशानी का कारण बन सकता है | खास बात यह है कि पानी का बहाव जिस दिशा में हो रहा था या हो रहा है उस दिशा को यानी पनबट को अवरूद्ध हमें नहीं करना चाहिये | बहुत लोग इस पर बिना ध्यान दिये कहीं से कहीं घर बना लेते हैं जिससे पानी बहने की दिशा में रुकावट आ जाती है | अगर रुकावट होगी तो घरों में पानी घुसेगा ही | इस तरह बिना बाढ़ के पानी से, साधारण तेज़ बारिस से भी जल जमाव हो जाता है और घरों, सड़कों को डूबाने लगता है | जो नदी के किनारे बसे हुए हैं उनको भी देखना होगा कि घर का पानी नाले द्वारा नदी में जा रहा है अथवा नहीं | नदी के जलस्तर पर भी नज़र रखनी होगी | बहुत लोग मुसीबत की घड़ी में भी घर छोड़ना नहीं चाहते हैं और बाद में परेशानी का सामना करते हैं |

मौसम विभाग द्वारा अलर्ट किये जाने के बाद उसके तदनुकूल सरकारी एजेंसियों को भी परिस्थिति जन्य उत्पन्न समस्याओं से लोगों को बचाने के लिये तैयार रहना चाहिये | बरसात के मौसम में पहाड़ों पर भूस्खलन होना आम बात है | भूस्खलन की कोई सूचना नहीं दी जा सकती है | इसलिये पहाड़ों पर रहने वालों के लिये उनका अपना अनुभव और जागरूकता ही काम आती है | हमारे देश के कुछ मैदानी भाग ऐसे हैं जहाँ बाढ़ हर साल आती है और पानी का जमाव ५ से ६ महीने रहता है | वहाँ के लोग परेशानियों से निपटने के लिये जरुरत के सारे सामान यहाँ तक कि आवागमन के लिये अपना नाव भी रखते हैं | बाढ़ की विकरालता उन लोगों पर उतनी परेशानी का कारण नहीं बनता है | जिन मैदानी क्षेत्रों से नदियाँ गुजरती है वहाँ बाढ़ आये या ना आये पर आने की सम्भावना बनी रहती है | अतः सतर्कता जरूरी हो जाता है | 

भारत को नदियों का देश कहा गया है | पहाड़ी क्षेत्र हो या मैदानी इलाका, छोटी-बड़ी नदियाँ दिखाई देती है | पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि बड़ी नदियों से छोटी-छोटी नदियों को जोड़ दिया जाय | यह बहुत ही अच्छी योजना है | बड़ी नदियों के जल स्तर में वृद्धि से छोटी-छोटी नदियों में पानी का प्रवाह हो जायेगा या छोटी नदियों में पानी का ज्यादा जमाव होने पर वह बड़ी नदियों की तरफ लौटेगा | इस योजना से छोटी-छोटी नदियों में पानी का भंडारण होगा जिससे खेती के लिये सिंचाई की सुविधा बढ़ेगी तथा जमीन के नीचे का पानी संरक्षित रहेगा | बाढ़ का भी खतरा कम होगा | बड़े-बड़े डैम बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी | बड़े-बड़े डैम भी कभी परेशानी का कारण बन सकते हैं | तूफ़ान और उससे होनेवाली क्षति पूर्णतया प्राकृतिक आपदा है | सूचना उसकी भी मिलती है मगर कुछ घंटे पहले | लोग उससे बचने के लिये तैयार नहीं हो पाते हैं |

जाड़ा, गर्मी और बरसात ये सभी ऋतुएँ हैं | एक के बाद दूसरे को आना ही है | गर्मी और जाड़े से बचने के लिये हम जरूरी संसाधनों की व्यवस्था कर लेते हैं तो क्या वर्षा ऋतु की आपदाओं से बचने के लिये हम कुछ भी नहीं कर सकते | कम से कम सुरक्षित जगहों की तलाश तो जरूर कर सकते हैं | आधुनिक परिवेश में हमारे बीच आपसी सद्भाव  और सामाजिक सहयोग की भावनाओं में ह्रास हुआ है | हम अपने अगल-बगल के लोगों को नहीं पहचानते हैं | हर समस्या चाहे वो घर की हो अथवा समाज से जुड़ी, के समाधान के लिये सरकार से अपेक्षा रखते हैं |

बाढ़ की समस्या के लिये मानवीय मूल भी एक कारण है | नदियों में बाँध जान माल की सुरक्षा के लिये बनाये जाते है लेकिन वही बाँध कभी आफत बन जाती है | केरल में बाढ़ नहीं आपदा है जो पचासों बाँध के टूटने से या कटने से उत्पन्न हुआ | अतएव नदियों के किनारे बाँध देने से पहले पर्यावरण विशेषज्ञों की राय आवश्यक है | पर्यावरण के असंतुलित होने से बारिस पर भी प्रभाव होता है | अति वृष्टि या अल्प वृष्टि पर्यावरण के असंतुलित होने से होता है | छोटी-बड़ी नदियों को जोड़ने से बाँध बनाने की आवश्यकता कम होगी | नदियों में गाद (silt) नहीं बनेगा तथा बाढ़ के पानी द्वारा लायी गई मिट्टियाँ खेतों की उर्वरकता बढ़ायेगी | बाढ़ का पानी आये और निकल जाये तो किसानों को फायदा होता है | उसी के अनुरुप खेती करते हैं | मछलियों का उत्पादन बढ़ जाता है | अतः बाढ़ अगर समस्या है तो समाधान भी है बशर्ते बाढ़ आपदा के रूप में न आये |


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