बेबसी

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बेबसी
बेबसी

जिन्दगी की तलाश में कहां से कहां आ गए हम…
विरान सी दीखती है राहें सारी, छाया है घनघोर अंधेरा,
लाशें ही लाशें बिछी है, एहसास भर भी कहीं न आखों में नमी है…..

कहीं तार तार हो रही आबरू, कहीं पैरों में दबी आरज़ू,
मासूमियत के कर्जदारों, किसी के हस्ती को रौंदने से पहले,
नज़रें उठा कर देख एक बार,ऐसे रुखसत होते नहीं दुनिया से मासूमों के कर्जदार…..

कैसे करें संरक्षण, जब दुनिया ही दानवों से भरी है,
पैरों के नीचे न ज़मी का एहसास, न सर पर आसमानों की छवि है….

आंखें भी बेसुध सी, नहीं अल्फाजों में ध्वनी है,
आँचल भी तार तार…. आबरू भी तार तार,
जीवन के हर मोड़ पर हो रही, आरज़ू भी तार तार……

ऐ मेरे ख़ुदा ये कैसे युग में तुमने हमें पहुंचा दिया,
इंसानों को ऐसे रौंदते है मानों, जैसे मसल रहें हो कोई कमल….

फ़ूलों को भी तोड़ने से पहले, सोचा होगा हर दिल ने एक बार,
कैसे मसल डालते हैं ऐ दुनियां वाले, खिलने से पहले कलियाँ हजार …..

बेरहम सी हो गयी दुनिया, न आंखे ही शर्म से झुकी है,
कैसे मिलाते होंगे ये नजरें, जो अपनों के दर्द के हैं कर्जदार….

देने वालें ने क्युं नही एहसासे नमी दी इनको,
दिल तो दिया ही होगा उनको भी, जिनकी हस्ती ही होगी दागदार……


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