भारत को मंदी के दौर से बाहर लाने वाले -मनमोहन सिंह

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भारत को मन्दी के दौर से बाहर निकाल कर, अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह के लिए आज का दिन बहुत खास है न केवल मनमोहन सिंह के लिए बल्कि इस देश के लिए भी आज का दिन खास है क्योंकि इसी दिन डॉ मनमोहन सिंह का जन्म हुआ था। 26 सितम्बर 1932 को पाकिस्तान के गाह नामक एक छोटे से गाँव में इनका जन्म हुआ था। देश का विभाजन होने के बाद उन्हें अपने परिवार के साथ भारत आना पड़ा।
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक बेहतरीन अर्थशास्त्री और राजनेता के रूप में जाने जाते हैं। 1990 के दशक के बाद भारत को मन्दी के दौर से बाहर निकालने का योगदान इन्हें ही जाता है।

मनमोहन सिंह की शिक्षा
मनमोहन सिंह बहुत ही सरल और अंतर्मुखी स्वभाव के हैं, लेकिन उन्हें पढ़ने लिखने में बहुत अधिक रुचि थी जिसके चलते वे न केवल देश अपितु विदेश भी गए। 1952 में उन्होंने अर्थशास्त्र विषय में ग्रेजुएशन पूरा किया। उसके बाद 1954 में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री ली। आगे की पढ़ाई के लिए वे इंग्लैंड के कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी गए। उसके बाद वह पंजाब यूनिवर्सिटी में बतौर प्रोफेसर के पद पर काम करते रहे।

राजनैतिक सफर
राजीव गांधी के कार्यकाल में मनमोहन सिंह को योजना आयोग का उपाध्यक्ष निवार्चित किया गया । इसके बाद वह प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिंह राव के आर्थिक सलाहकार भी नियुक्त हुए । 2004 में वह प्रधानमंत्री बने उसके बाद उन्होंने 2009 में दूसरी बार फिर प्रधानमंत्री का पद संभाला। प्रधानमंत्री के पद पर आसीन रहते हुए उन्होंने देश के लिए बहुत से ऐसे फैसले लिए जिससे देश की अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा बदलाव आया या कह लीजिए देश की डूबती अर्थव्यवस्था की नैया पार लगाई।

देश को मन्दी के दौर से बाहर निकालने के लिए डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा लिए गए अहम फैसले :-

सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत की हालत आजादी के बाद एक बार फिर से गुलाम बनने वाली थी अर्थव्यवस्था की चपेट से। आजादी के बाद भारत की आर्थिक स्तिथि बहुत खराब हो चुकी थी। 1990 के दशक तक पहुंचते हुए भारत की हालत इतनी बिगड़ गई थी । भारतीय अर्थव्यवस्था के पास मात्र 2 सप्ताहों तक ही आयात करने की रकम बची थी। ये रकम मात्र 2 अरब डॉलर थी उसके बाद देश कैसे चलता इसके सवाल से सब परेशान थे। उसी वक्त अर्थशास्त्र में बेहतरीन समझ रखने वाले और उस समय के वित्त मंत्री डॉ .मनमोहन सिंह ने देश को इस संकट से बाहर निकालने के लिए जो निर्णय लिए उसकी तारीफ आज सभी करते हैं।
1991 में मनमोहन सिंह ने नई आर्थिक नीति की नींव रखी। जिसके तहत ये बदलाव किए गए व कुछ नई योजनाओं को शुरू किया गया।

1.उदारीकरण की नीति – उदारीकरण की नीति को अपनाते हुए विश्व के लिए भारतीय बाजारों के दरवाजें खोले गए। विदेशी कम्पनियों और निवेशों को प्रोत्साहन दिया गया। उदारीकरण की नीति को अपनाते भारतीय बाजारों को वैश्विक अर्थव्यवस्था में ओपन इकनॉमी ( खुली अर्थव्यवस्था ) के रूप में सामने लाया गया।

  1. गैर जरूरी नियंत्रणकारी और परमिट से देश की अर्थव्यवस्था को गति दी गई।
  2. जब भारत के पास आयातों का भुगतान करने के लिए विदेशी मुद्रा समाप्त होने की कगार पर थी तब भारत को राजकीय कर्ज में कोई नुकसान न हो इसके लिए कई टनों सोना गिरवी रखना पड़ा था।
  3. भारतीय औद्योगिक अर्थ व्यवस्था को अनावश्यक नौकरशाही से मुक्त किया।
  4. प्रत्यक्ष विदेशी विनियोग FDI पर नियंत्रणों को हटाया व घरेलू साहसियों के लिए के लिए MRTP अधिनियम के नियंत्रणों को कम करा।
  5. कृषकों की दशा को सुधारने के लिए फसलों का समर्थन मूल्य बढाया जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति बहाल हो सके।
  6. राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून की शुरुआत की।

1991 में अपनाई गई नीतियां जैसे कि लाइसेंस नियंत्रण , नौकरशाही को न्यूनतम करना।

दा इकनॉमिक्स टाइम्स की रिपोर्ट में दिए आंकड़ों के अनुसार नई आर्थिक नीति के बाद से तकरीबन 13.80 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर लाया जा चुका है।

एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक 1980 से 81 के दशक में जीडीपी 7,98,504 करोड़ रुपये थी और वृद्धि दर 7.2 थी। 1990 से 1991 में जीडीपी -13,31,040 करोड़ रुपये थी और वृद्धि दर 5.1 थी। 1991 की नई नीति के बाद अर्थव्यवस्था में सुधार आया जिसके बाद 2001 -2 में जीडीपी 19,72,606 करोड़ रुपये हुई और वृद्धि दर 5.8 हुई थी।
उसके बाद ये 2012 तक आते- आते जीडीपी वृद्धि दर 7.0 तक पहुंच गई थी।

महामारी के कारण आर्थिक मंदी की मार झेल रही भारतीय अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए भी डॉ मनमोहन सिंह ने भाजपा सरकार को सुझाव दिए थे। उन्होंने बीबीसी को लिखी अपनी मेल में बताया था कि भारत इन नीतियों के सहारे महामारी से उपजी विकट परिस्थितियों से कैसे निपट सकता है। ये सुझाव इस प्रकार से हैं।

  • सांस्थानिक स्वायत्तता और प्रक्रियाओं के जरिए वित्तीय सेक्टर की समस्याओं को हल करना चाहिए । नकदी की मदद जिससे उनकी आजीविका सुरक्षित रहे और उनके हाथ में खर्च लायक पैसा हो।
    व्यवसायों के लिए पूँजी उपलब्ध करनी चाहिए और इसके लिए सरकार को समर्थित क्रेडिट गारंटी प्रोग्राम चलाने की जरूरत है।

पुरस्कार –
1956 में कैम्ब्रिज विश्विद्यालय का ऐडम स्मिथ पुरस्कार
1987 में पद्मविभूषण पुरस्कार
1993 और 1994 का एशिया मनी अवार्ड फ़ॉर फाइनेंस
1994 में यूरो मनी अवार्ड फ़ॉर द फाइनेंस मिनिस्टर ऑफ द ईयर
1995 में इंडियन साइंस काँग्रेस का जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार

पुस्तकें-
1.Changing india
2.Prime minister ,manmohan singh June 2005 to may 2006
3.Global trading system ,the WTO ,and the developing countries
4.The quest for equality in development
5.To the nation for the nation .

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