भारतीय लोकतंत्र में मुसलमान राजनीतिक दलित !

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भारतीय लोकतंत्र में मुसलमान राजनीतिक दलित !
भारतीय लोकतंत्र में मुसलमान राजनीतिक दलित !

एक हिन्दी न्यूज़ चैनल पर चर्चा के क्रम में असदुद्दीन ओवैसी ने कहा – “मैं राजनीतिक दलित हूँ” | ओवैसी  के कहने का अन्दाज़ जो भी हो लेकिन उन्होंने अपनी स्थिति को स्पष्ट कर दिया | मुसलामानों ने लगभग ५०० (पाँच सौ ) वर्षों तक लगातार भारत पर शासन किया | उससे पहले भी मुसलामानों का आक्रमणकारी शासक के रूप में पहचान रहा | अंग्रेजों से स्वतंत्रता प्राप्ति आन्दोलन के समय भी उनकी अच्छी – खासी सक्रियता रही | संख्या बल कम होने के बावजूद उनके विचारों का दबदबा रहा | अपने ठोस विचार और हद की सक्रियता एवं राजनीतिक सूझ बुझ के कारण वो अपने लिये अलग से देश बनवा लिये भले ही भारत का बँटवारा से ही क्यों न हुआ हो | स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद खंडित भारत (आज का भारत) में लोकतंत्र की स्थापना हुई | देसी राज रजवाड़ों का अन्त हो गया |

भारतीय लोकतंत्र के लगभग सत्तर सालों में मुसलामानों को लोकतंत्र का एक मजबूत स्तम्भ होना चाहिये था मगर वो ऐसा नहीं बन पाये | इसका कारण यह है कि मुसलमान लोकतंत्र को अपना नहीं पाये | राजतांत्रिक मानसिकता ने उनको कैद करके रखा है | फलतः आज वो हासिये पर हैं | वे किंकर्तव्यविमूढ़ हैं | वे देश दुनियाँ के बदलते परिवेश को समझने  का प्रयास ही नहीं किया | सामाजिक, सांस्कृतिक, शिक्षा एवं आर्थिक आदि सभी पहलुओं में भारत में अमूल परिवर्तन हुआ है | भारत ही नहीं विदेशों में भी यही हाल है | इस तरह के बदलाव को उन्हें कबूल करना नागवाँर लगा | इस कारण वो भारतीय लोकतंत्र में अलग – थलग हो गये | क्या करें क्या नहीं करें वो समझ नहीं पा रहे हैं | भाषण जितनी भी अच्छी कर लें मगर विचारों की कमी की भरपाई नहीं कर पा रहे हैं |

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय या उसके कुछ समय बाद तक उनकी जनसंख्या कम थी मगर राजनीतिक सूझ बूझ थी | आज उनकी जनसंख्या कई गुणा बढ़ गयी है लकिन उसी हिसाब से उनकी राजनीतिक सूझ बूझ घट गई है | राजनीतिक रूप से वो सिकुड़ गये हैं | विचारों में खोखलापन है | आज का समय विचारों (ideology) का है, राजनीतियों का है | इस पर उन्हें अमल करना होगा और तभी वो आगे बढ़ सकते हैं और देश को आगे बढ़ा सकते हैं | इस परिपेक्ष में असदुद्दीन ओवैसी का यह कहना कि “मैं राजनीतिक दलित हूँ” बिलकुल सही लगता है |


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