चुनावी राजनीति

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चुनावी दौर की राजनीति।
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है जिसने गुलामी की बेड़ियों को तोड़ कर आज़ादी हासिल की और खुद को लोकतंत्र की श्रेणी में अव्वल रखा। चुनाव भारत में आज़ादी के बाद से चला आ रहा है। पहले की अपेक्षा वर्तमान भारत में चुनावी राजनीति में बहुत ज्यादा बदलाव देखने को मिला है। पहले उम्मीदवारों का प्रोपोगेंडा जन कल्याण और सामाजिक उत्थान होता था पर समय के साथ साथ उसमें बदलाव हुए और कहीं न कहीं जनकल्याण से हटकर उद्देश्य विपक्ष की हार तक सिमट गया। आज के दौर में नेता पहले जैसे आदर्शवादी नहीं रहे, देश हित और समाज हित से निकल कर हर पार्टी का उद्देश्य विपक्ष की हार और जनता को गुमराह करना हो गया है।।

  • आदर्श नेता और स्वच्छ राजनीति,
    पहले और अब।

आजादी के बाद एक समय था जब सोशल मीडिया और इंटरनेट नहीं हुआ करते थे, तब चुनावी प्रचार प्रसार में जनसंपर्क और जनसभाओं का जोर हुआ करता था। हर पार्टी की अपनी एक स्पष्ठ और जनहित वाली विचारधारा हुआ करती थी। प्रचार प्रसार के दौरान पार्टी के नेता जनता के लिए क्या कर सकते थे इस पर जोर देते थे न कि इस पर बाद में ध्यान देते थे कि विपक्ष से क्या शिकायत है। और वर्तमान हालात ये हैं कि 1 घंटे में 50 मिनट तो विपक्ष की कमियां निकालने में निकल जाती है, नेता हेलीकाप्टर से उतरकर ,भव्य सभा और भारी व्यवस्था के बीच किसानों को गरीबी से हटाने की बात करते हैं ,युवाओं को प्रचार में लगाकर रोजगार से उनका ध्यान भटकाते हैं।
इस पर भी काम नहीं हुआ तो ज़मीर खरीदने के लिए 15 लाख, 72 हज़ार और न जाने कितने झूठे वादे करते हैं।
जो मुख्य जरूरत है आम जनता की उस पर कभी चर्चा नहीं करते, बस धर्म,जात, वर्ग के हिसाब से बंटवारा करना आता है और कुछ नहीं। दुर्भाग्य यह है कि आज कल उस नेता को भी पार्टी आसानी से टिकट दे देती है जिस पर कई जघन्य और संगीन आरोप होते हैं। कभी समय था जब खड़े खड़े, चौपाल पर ,पेड़ के नीचे, या मेले में सभाएं हो जाया करती थीं पर आज काफिले के नाम पर 20 से ज्यादा गाड़ियां एक विधायक या संसद के पास होती हैं। और आश्चर्य की बात तो तब है जब चुनाव के बाद खुद नेता को याद नहीं रहता उसने जनता से क्या वादा किया था।।।।

  • वोट बैंक की राजनीति।
    जनता के अंदर विश्वाश जगाने और उसे लुभाने के लिए नेता किसी भी हद तक जा सकते हैं। कभी किसानों के साथ कटी फसल को हाथ लगाकर फ़ोटो खिंचवाना और कभी गरीब के घर बैठकर खाना खा लेना लोकप्रियता के मकसद से एक बेहतर विकल्प हो सकता है पर यह कि एक निम्न स्तर की राजनीति मानी जाती है, खासकर तब जब चुनाव का बाद किसान और गरीब की स्थिति में कोई सकारात्मक सुधार न हो।वर्तमान चुनाव प्रचार का मानक कर्मठ और ईमानदारी से हटकर धन प्रदर्शन और प्रसिद्ध चेहरे को रू ब रू करवाना हो गया है।
    नेता एवं पार्टियां अपनी छवि सुधारने की बजाय एक दूसरे के दोषारोपण में लगी हुई हैं और जनता को भी इन्हीं अनंत और अनसुलझे मुद्दों में भटका दिया है।
    खराब राजनीति की शिकार जनता।।

आज कल के दौर में चुनाव लड़ने के लिए इतने पैसे खर्च कर दिय जाते हैं जितने में देश का कई है तक भला हो सकता है । पोस्टर से लेकर लाउडस्पीकर ,बाईक रैली,गाड़ियां , लोगों को पैसे दे कर नारे लगवाना, हेलीकाप्टर से प्रचार आदि। राजनीति के सही मायने ही बदल गए हैं।
हिन्दी के प्रसिद्ध कवि सहाय ने कहा था ” लोकतंत्र का अंतिम क्षण है खुल कर आप हंसे ।इस जगमंगाते लोकतंत्र में लोकतंत्र का अंतिम क्षण छुपा है ।इस क्षण की पहचान हमेशा लोकसमाज के कानों में सुनाई पड़ती है जिन्हें कभी वह सुनता है तो कभी वह नहीं सुनता ।”
ये होती थी स्वच्छ राजनीति की शुद्ध परिभाषा लेकिन तत्काल समय में केवल वोट बैंक और स्वार्थ को को महत्व देते हुए नेता दल बदल लेते हैं ।जिसका राजनीति दल का दबदबा अधिक होता है उसमें मेढक की तरह छलांग लगा लेते है वोट हासिल करने के लिए अपने अपने समूहों को विभाजित कर लेते हैं।

1.किसानो से वोट लेने के लिए उनके साथ उनकी फसल कटवाना हो या निम्न वर्ग के घर खाना खाना हो
2.शराब और पैसे बांटना व विभिन्न धर्मों या जाति को अलग अलग बांट कर ये बोलना हम इस विशेष धर्म के अधिकारो की रक्षा करेंगे ,समाज में मान सम्मान दिलाएंगे । सब वोट बैंक की राजनीति है ।

इसी को चुनावी राजनीति कहा जाता है। सत्ता में आने और पैसे कमाने की भूख इतनी बढ़ गई है कि ऐसे उम्मीदवारो ने आजादी के बाद देश की अखंडता एवं एकता को बहुत क्षति पहुंचाई है । धार्मिक ,सामाजिक भेद भाव बढाने में ,लोगों को एक दूसरे के लिए भड़काने कर हिंसा कराने में कोई कसर नहीं छोड़ा। ऐसी ही गन्दी चुनावी राजनीति के पीछे एक षड्यंत्र होता है जिसका समाज कल्याण और देश का विकास हिस्सा नहीं है। नेता एवं पार्टियों को इस विषय से कोई खास मतलब नहीं होता।

अटल जी का कहना था।
जान के तू लेकर निकला है विजयी शंकर ।
अब न चलेगा ढोंग ,दम्भ ,मिथ्या ,आडम्बर
अब न चलेगा राष्ट्रप्रेम का गर्हित सौदा
यह अभिनव चाणक्य न फलने देगा विष का पौधा
आज जगेगा जग जननी का सोया भाग्य सितारा
कोटि पुष्प चढ़ रहे देव के शुभ चरणों पर
कोटि चरण रहे ध्य्ये की ओर निरन्त ।

इस दौर की राजनीति आश्चर्यजनक और विडम्बनाओं से भरी हुई है। जहाँ रहस्यों पर रहस्य छिपे हैं। आज देखिये पानी की तरह पैसा बहाए जा रहे हैं। दलगत राजनीति के आगे सकारत्मक और राष्ट्रहित की विचारधारा खत्म हो रही है। राजनीति को लोगो ने पेशा बना लिया है पर सोचने बात है कि यह भी कभी पेशा हो सकती है भला …??..

राजनीतिक दल चुनाव से पहले जातिगत हिसाब किताब मिलाते हैं हार जीत का समीकरण बिठाते है। जिस जाति का वोट बैंक उस जाति का नेता ये तो समाज को जातियो के नाम पर बाटने वाली बात हो गई। नेताओं को चुनावी राजनीति छोड़कर देश के उद्धार के बारे में विचार करना चाहिए तभी देश और देशवासियों का विकास संभव है

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