कांग्रेस का समर्पण ?

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कांग्रेस का समर्पण ?
कांग्रेस का समर्पण ?

भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गाँधी भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के आधारभूत सिद्धान्त “धर्म निरपेक्ष पार्टी” की छवि बदलने की होड़ में हैं | उनका मन्दिर-मन्दिर जाकर पूजा करना, जनेऊ धारण करना, अपने को ब्राह्मण कहना पार्टी की बदलती नीति को दर्शाता है | इस की संपुष्टि भी अब तो गुलाम नबी आजाद के कथन से हो जाती है जिनमें उन्होंने कहा है कि पहले मुझे 95% हिन्दू और 5% मुस्लिमों की सभा या कार्यक्रमों में बुलाया जाता था लेकिन बदलते परिवेश में हिन्दुओं का प्रतिशत मात्र 15% हो गया है | उनके कहने का तात्पर्य तो वही जाने मगर सच्चाई तो यही सामने आती है कि कांग्रेस या कांग्रेस द्वारा प्रायोजित सभाओं या कार्यक्रमों में हिन्दू कांग्रेसीयों को उनकी उपस्थिति से परहेज है | इसका सीधा-सीधा अर्थ है कांग्रेस भी मुस्लिमों को खुश करने वाली अपनी छवि को दूर करना चाहती है | आज से लगभग छः महीने पहले से ही बड़े कांग्रेसी नेता भारतीय जनता पार्टी को सांप्रदायिक पार्टी नहीं कह रहें हैं |

जो कांग्रेस पहले ‘हिन्दू’ शब्द से भी परहेज करती थी | पूजा-पाठ करने वाले हिन्दुओं को आतंकवादी, तालिबानी कहते नही थकती थी | मन्दिर जाने की बात क्या, रास्ते में पड़ने वाले मन्दिर के कारण अपना रास्ता बदल लेती थी वही कांग्रेस आज मन्दिर में जाने के लिये रास्ता बदल रही है | इस वर्ष विजया-अष्टमी को कन्या पूजन से भी नहीं चूकी है | क्या यह कांग्रेस का नीतिगत परिवर्तन है या वोट बटोरने की राजनीति | जो भाजपा का आधारभूत नीति माना जाता था जिसको लेकर उसे सांप्रदायिक पार्टी कहा जाता था और अन्य पार्टियाँ उसे अछूत मानती थी वही कांग्रेस आज भाजपा की नीति में सेंध लगाने पर आमदा है | दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस भाजपा के सामने नतमस्तक हो गई है |


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