कॉंग्रेस के परिवार की पराकाष्ठा !

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कॉंग्रेस के परिवार की पराकाष्ठा !
कॉंग्रेस के परिवार की पराकाष्ठा !

पिछले सप्ताह से राजीव गाँधी फाउंडेशन (आरजीएफ) के माध्यम सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, प्रियंका बाड्रा और कॉंग्रेस के कुछ लोग जबरदस्त चर्चा में आ रहे हैं | कॉंग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी आरजीएफ की अध्यक्ष हैं | चंदे के नाम पर सोनिया गाँधी ने 2006-07 में चीन के 90 लाख रूपये आरजीएफ के लिये स्वीकार किया | इसके तुरत बाद 2008 में भारतीय कॉंग्रेस पार्टी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना के बीच एक गुप्त समझौते का मुद्दा भी उजागर हुआ | भारत चीन के बीच बढ़ते तनाव के दरमियान इस समझौते के प्रकाश में आने से एलएसी (गलवान घाटी) पर 15 जून की रात को धोखे से आक्रमण करने वाले चीनी सैनिकों पर भारतीय सैनिकों द्वारा की गई  प्रतिक्रियात्मक कारवाई और एतद सम्बन्धी सरकार की पहल को लेकर कॉंग्रेस की गलत बयानबाजी और देश के प्रति नकारात्मक रुख व्यक्त करके लोगों में भ्रम फ़ैलाने बाली सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के साथ उनके सहयोगी नेतागण पर अंगुलियाँ उठने लगी है | समझौते के विषय सूची का खुलासा अभी तक नहीं हुआ है और इस पर सोनिया परिवार की प्रतिक्रिया भी आना बाँकी है | वर्तमान संकट के समय समझौते पर उनकी चुप्पी और सैनिकों को लज्जित करने के लगातार आते बयान बहुत कुछ बयाँ करती है | लोग अचंभित हैं |

15 जून 2020 की रात टेबुल वार्ता समाप्त होने के बाद चीनी सैनिकों ने धोखे से भारतीय सैनिकों पर हमला कर दिया जिसमें भारत के कर्नल समेत 20 सैनिक शहीद हो गये लेकिन वे सैनिक शहीद होते होते चीन के 45 से 50 सैनिक मार डाले और कितनों को घायल कर दिये जिसमें एक कर्नल भी मारा गया और एक कर्नल को जीवित बंदी बना लिया गया | इस घटना पर एक ओर जहाँ भारतीय सैनिकों के साहस और पराक्रम की प्रशंसा हो रही थी वही देश के विपक्षी दलों ने खासकर कॉंग्रेस ने नाराजगी जताते हुए सैनिक और सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया | भारत चीन सीमा विवाद पर प्रधानमंत्री मोदी द्वारा 19 जून 2020 को बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में भी कॉंग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और बामदलों ने सेना की खामियों को बेवजह गलत करार देते हुए सरकार की नीति एवं नियत पर संदेह व्यक्त किया जबकि अन्य विपक्षी दलों ने भारतीय सैनिकों की सराहना करते हुए सरकार का साथ देने का भरोसा दिया |

1998 में सोनिया गाँधी कॉंग्रेस अध्यक्ष चुनी गई | उसके बाद ही सोनिया गाँधी सक्रिय राजनीति में आई और अपने पूर्व प्र. मंत्री राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी के नक़्शे कदम पर सत्ता के दोनों पदों पर आसीन होने की योजना बनाने लगी | 2004 में कॉंग्रेस सत्ता में आई लेकिन सोनिया गाँधी विदेशी मूल की होने के कारण प्रधानमंत्री पद के लिये अयोग्य साबित हुई और प्रधानमंत्री नहीं बन सकी | आज की परिस्थिति और सोनिया गाँधी के चीनी सम्बन्धों  को जोड़ कर देखने से एक आशंका व्यक्त की जा सकती है कि रुष्ट सोनिया गाँधी कॉग्रेस के बैनर तले भारतीय लोकतन्त्र को दूसरे रास्ते पर ले चलने की योजना तैयार करने में 2004 से जुट गई | अमेरिका और इंग्लैंड की लोकतांत्रिक प्रणाली को दर किनार कर भारतीय बामदलों से अपने पुराने रिश्तों को याद करते हुए पड़ोसी चीन का रुख लिया | 2004 में वास्तविक रूप से देश की सत्ता हासिल करने में असफल रहने के बाद चीन के तर्ज पर  पार्टी अध्यक्ष होने के नाते सत्ता अपने हाथ में रखने के मंसूबे से उन्होंने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिये इस शर्त के साथ समर्थन दिया कि उनका नाम मात्र प्रधानमंत्रियों की सूची में दर्ज रहेगा | इस व्यवस्था को अंजाम देने में वामपंथियों ने सोनिया गांधी का  भरपूर साथ दिया और उन्हीं लोगों ने सोनिया की कॉंग्रेस पार्टी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना के बीच रिश्ता बनाने के लिये उनको राजी किया | इस तरह भारत की तत्कालीन रूलिंग और सबसे बड़ी पार्टी कॉंग्रेस तथा कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना के बीच एक गुप्त समझौता हुआ | समझा जाता है कि उसके उपरान्त ही बानगी के तौर पर चीन ने आरजीएफ को 90 लाख रूपये का चंदा दिया | जब सोनिया गाँधी अपने पूरे परिवार के साथ 2008 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना के निमंत्रण पर पाँच दिन की यात्रा पर चीन गई तब समझौता को वास्तविक स्वरुप दिया गया |  कॉंग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना के तत्कालीन महासचिव सी जिंगपिन की उपस्थिति में राहुल गाँधी, कॉंग्रेस महासचिव और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना के अधिकृत पदाधिकारी दोनों ने हस्ताक्षर किये | इन सब  का खुलासा मीडिया में आये  समाचार और दिखाये गये फोटो से हुआ है | मीडिया ख़बरों को यदि सच मान लिया जाय तो दोनों देशों के तत्कालीन रूलिंग पार्टियों के बीच समझौते को लेकर आज कयास लगाये जा सकते हैं कि दोनों मिलकर अपने देश के आर्थिक एवं वैचारिक विषयों से जुड़े आंतरिक एवं बाह्य राजनीतिक और कूटनीतिक पहलू पर साथ कार्य करेंगे और एक दूसरे के राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय हितों की रक्षा करेंगे | संधि को एक दृष्टान्त से समझा जा सकता है की डोकलाम में भूटान के पक्ष में भारतीय सेना चीनी सैनिकों के सामने खड़ी थी और राहुल गाँधी आधी रात को दिल्ली के चीनी दूतावास में उसके राजदूत के साथ डिनर कर रहे थे | इस मीटिंग को गुप्त रखा गया मगर बाद में यह मीडिया में उजागर हो गया | अन्य पहलू हैं: सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी भारत चीन सीमा विवाद पर चीन के हितों के रक्षार्थ भारतीय सैनिकों और सरकार के विरुद्ध शर्मनाक बयानबाजी कर रहे हैं | अपनी इसी नीति के अंतर्गत पाकिस्तान द्वारा पीओके का 5000 वर्गकिलोमीटर चीन को गिफ्ट करने का भारत ने कभी विरोध नहीं किया | सियाचिन का इलाका भी पाकिस्तान को दिये जाने का एकरार दोनों देशों के बीच लगभग तय हो गया था लेकिन तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष जे जे सिंह ने इसका विरोध कर दिया तब जा के भारत, चीन और पाकिस्तान के बीच सामरिक दृष्टिकोण से अत्यन्त महत्वपूर्ण क्षेत्र बच पाया | वर्तमान भारत चीन तनाव में भारत का भूभाग सियाचिन सामरिक दृष्टि से चीन के लिये सबसे बड़ा अभिशाप है | यह दो सरकारों के बीच की संधि नहीं थी | मनमोहन सिंह ने भी 2004 से 2014 तक प्रधानमंत्री रहते हुए और 2014 से आज तक सोनिया गाँधी के प्रति अपनी ईमानदारी और वफादारी निभा रहे हैं | राहुल गाँधी, प्रियका बाड्रा के अलावे मनमोहन सिंह भी आरजीएफ के सदस्य हैं |    

यह तो संयोग की बात है कि 2014 के आम चुनाव में जनता ने सोनिया गाँधी और उनकी पार्टी को सिरे से ख़ारिज कर दिया, नहीं तो सी जिंगपिन के हित साधने में सोनिया गाँधी भारत को किस स्तर पर लाकर खड़ा कर देती इसका अंदाजा लगाया जा सकता है | 2014 की हार का बदला 2019 में लेने की उसकी मंशा पर भी जनता ने पानी फेर दिया | धन्यवाद के पात्र हैं भारत की जनता | कॉंग्रेस पार्टी मोदी के नेतृत्व में बनी देश की भाजपा सरकार का विरोध गत 6 वर्षों से करती चली आ रही थी | राहुल गाँधी ने कहा कि मोदी एलएसी पर सरेंडर कर दिया है | कोरोना के आगे मोदी का सरेंडर… आदि आदि | कश्मीर से धारा 370 हटाने पर कॉंग्रेस की भांति चीन ने भी नाराजगी जाहिर की है | 29 जून 2020 को भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा एवं निजता के ख्याल से चीन के 59 डिजिटल ऐप को बंद कर दिया है जिसका विरोध चीन और कॉंग्रेस ने एक साथ किया है | सरकार के किसी भी कार्य का समर्थन करना सोनिया और राहुल के शब्दकोष में नहीं है क्योंकि, सोनिया गाँधी और सी जिंगपिन के बीच की संधि उनकी मज़बूरी है | सी जिंगपिन आज पार्टी प्रमुख और राष्ट्रपति दोनों पद पर आसीन हैं |

आज भाजपा की सरकार के बदले कॉंग्रेस पार्टी की सरकार होती तो लगभग ये तय था कि भारत और चीन में सीमा विवाद होता ही नहीं | मनमोहन सिंह कागजी प्रधानमंत्री होते और सत्ता कॉंग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के पास होती | सी जिंगपिन की हर ख्वाहिश पूरी होती रहती | भारत का उत्तर और उत्तर पूर्व का हिस्सा आज किस स्थिति में होता अंदाज लगाया जा सकता है | शुक्र है मोदी जी की सरकार है और सैनिक चीन भारी पर रहे हैं | चीन घबराहट में है जिसे कॉंग्रेस का परिवार पचा नहीं पा रहा है | संधि की सत्यता अभी आनी बाँकी हैं लेकिन भारत चीन विवाद पर कॉंग्रेस ने हद कर दी | अब भी बचिये |

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