कोरोना काल : लोगों में समझदारी बढ़ीं है !

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कोरोना काल : लोगों में समझदारी बढ़ीं है !
कोरोना काल : लोगों में समझदारी बढ़ीं है !

कोरोना महामारी से पूरी दुनियाँ घबराई हुई है | लाखों लोगों की जानें गई है क्योंकि इसकी कोई दवा नहीं है और न हीं कोई वैक्सीन तैयार हो पाया है | परहेज और रोग से लड़ने की अपनी शारीरिक क्षमता ही इसके बचाव हैं | भारत में लोकडाउन और इसके दूसरे पहलू सोशल डिसटान्सिंग (सामाजिक दूरी) से बहुत लाभ हुआ है | जनसंख्याँ के दृष्टिकोण से यहाँ मरने बालों की संख्याँ का प्रतिशत कम है |

लोकडाउन से लोगों की जान तो बची हीं है साथ ही सामाजिक माहौल में भी एक सार्थक बदलाव आया है | लोगों में अपने परिवार, भाई-बंधु के प्रति एक आकर्षण बढ़ा है | इस तरह की भावनाओं का ह्रास होता जा रहा था | अपने परिवार, पति पत्नी एवं बच्चों के बीच की कड़ी सिर्फ पैसा ही रह गया था | कोरोना संक्रमण की निरपेक्षता ने मानवता के लिये कई सापेक्षिक संबंधों की आवश्यकता को उजागर कर दिया | लोकडाउन से लोगों में समझ पैदा हुई की पैसे से अलग भी हमारे बीच कोई महत्वपूर्ण सम्बन्ध है | उनमें यह भय उत्पन्न हुआ की कोरोना से यदि वो संक्रमित हुए तो उनका पूरा परिवार परेशान हो जाएगा | इस चिन्ता ने एक बार फिर लोगों को भूले बिसरे सामाजिक वातावरण की ओर मोड़ दिया है | परिवार एवं समाज की महत्ता का एहसास करा दिया | लोकडाउन में जबरन साथ रहने, खाने-पीने की बाध्यता ने लोगों के जीवन में साथ जीने की प्रेरणा भर दी | बड़ों से लेकर छोटे को भी एक दूसरे के प्रति अपने कर्तव्यों के पालन करने का पाठ पढ़ाया है | बिना किसी दबाव के अनुशासित होने का सीख दिया | भीड़ों में पंक्तिबद्ध होने से लेकर एक दूसरे से हाथ मिलाकर अभिवादन करने की जगह हाथ जोड़ कर नमस्ते/नमस्कार करने की संस्कृति को पुनर्जीवित कर दिया | डर होना चाहिए | डर सबों को होना चाहिए | कानून का हो या रोग का हो,  बड़ों से या छोटे से डरना जरुरी है | यह सीख भी यहाँ मिल रही है | कुछ खो कर ही सही हमे बहुत कुछ पाने का अवसर प्राप्त हुआ है |

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