दहेज़

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दहेज़
दहेज़

भारत जून १६

दहेज़ 

दहेज की आँधी में

उड़ गए सारे रिश्ते |

ढह गए हौंसले हमारे

बिखर के रह गए सारे सपने | 

क्या हालत हो गयी हमारी

लेने वालों ने न अपनाया

देने वालों ने न संभाला 

बेबस और लाचार हो गयी जिन्दगी हमारी |

हम न जान सके फिर भी 

कब बन के रह गए हम बली

कब हो गयी कुर्बानी हमारी |

आखों में आसूं होगी ये तो था हमको भी पता 

कब लहू ने ले लि जगह 

ये न हम जान सके |

दहेज़ ने हमारी हस्ती ही मिटा डाली 

एक एक करके साड़ी पतवार ही जला डाली |

तुम भी न जा पाओगे पार इस भँवर के 

जो न बचा के रखोगे हमें 

एक दिन तुम भी खाक होके रह जाओगे |

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