दलित क्यों, सबका साथ सबका विकास !

0
5
दलित क्यों, सबका साथ सबका विकास !
दलित क्यों, सबका साथ सबका विकास !

देश में आज भी विकास हीं असली मुद्दा है | ऐसी बात नहीं की आजादी के सात दशकों में विकास नहीं हुआ है | कम या ज्यादे हर क्षेत्र में विकास हुआ है एवं जैसे जैसे विकास की दर बढ़ती गई वैसे हीं नैतिकता और आपसी सद्भाव में ह्रास आता गया | सरकार और समाज दोनों इस ओर गम्भीर नहीं हुए | स्पष्ट है कि नीति और रीति में तादातम्य का अभाव रहने के कारण समाज के निचले स्तर तक सरकार की योजनाओं का पूर्ण लाभ सही रूप से पहुँचने में कारगर नहीं हुआ | उनको लेकर हमारे राजनेताओं का करिश्माई भाषण ने सामाजिक परिवेश में हलचल पैदा कर दी |

शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं उद्योग के क्षेत्र में सरकार ने बहुत सारी जन – कल्याणकारी योजनायें सामाजिक पटल पर रखा | उन योजनाओं के लाभार्थियों में से कुछ वर्ग विशेषों को अतिरिक्त लाभ देने के उद्देश्य से अलग से प्रावधान भी किये गये | इन प्रावधानों के क्रियान्वयन से समाज के विभिन्न वर्गों के बीच वैचारिक मतभेद उत्पन्न होने लगे जिसे स्वाभाविक हीं कहा जा सकता है | खतरनाक स्थिति तो तब पैदा होनी शुरू हुई जब उन वर्ग विशेष के लोगों के बीच इर्ष्या एवं आपसी द्वेष उत्पन्न होना प्रारम्भ हुआ | उन्हें ऐहसास होने लगा कि उनके अपने हीं प्रबुद्ध प्रतिनिधि उनकी प्रगति में बाधक हैं | वे अंदर हीं अंदर बौखला रहे थे लेकिन उनसे संरक्षित होने के कारण विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे | शर के ऊपर से पानी बहने की जब नौबत आई तो वे अपनों के बहाने एक जुट होकर समाज के दुसरे वर्गों पर ठीकरा फोड़ कर आक्रोश का इजहार किया | अपने पिछड़ेपन के लिये अन्य वर्गों को दोषी ठहराने लगे | उनके प्रबुद्धों ने समर्थन देकर उनकी सहानुभूति पा ली | संरक्षण तो था हीं | राजनीतिक दल अब इनके आगे पीछे आ गए |  ऐसे लोगों के समूह को दलित का नाम दिया गया | यहीं से दलित राजनीति उजागर हुई |  इसके प्रचार प्रसार में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का भरपूर सह्योग लिया गया |

दलितों एवं उनकी समस्याओं को लेकर राजनेताओं का भाषण और कार्यक्रम आयोजित होने लगे | बुद्धजीवियों और लेखकों के भरकाऊ लेख छपने लगे | इलेक्ट्रोनिक मीडिया में इन विषयों पर उनके डिबेटों का प्रसारण होने लगा | नेता बनने की चाहत में उनके प्रतिनिधि सरकार के संग समाज को कोसते कोसते धमकियाँ देने पर उतर आये | खून खराबे की अंदेशा से समाज सकते में आ गया |

दशकों से हमारे सामाजिक संबंधों के बीच दरारें बढ़ती जा रही हैं | देश को सुरक्षित बनाने में आपसी सामाजिक सम्बन्ध का मजबूत होना अहम् है | देश में विकास हेतु तात्कालिक आवश्यकता महसूस की जाने वाली सूची में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, उद्योग, कृषि, तकनीकी और सामरिक शक्ति के साथ सामाजिक व्यवस्था को भी डालना जरुरी है | लेखकों एवं बुद्धजीवियों को सामाजिक परिवेश में प्रवेश करने से पहले गम्भीर चिंतन की जरूरत है | सामाजिक सम्बन्धों में आयी दरारों को मिटाने में उनकी जबरदस्त भूमिका होती है | सटीक है नरेन्द्र मोदी का नारा “सबका साथ सबका विकास” | इसमें आग्रह भी है और दम भी |

Follow @India71_

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here