धारा 497 का अन्त – सही या गलत

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धारा 497 का अन्त- सही या गलत
धारा 497 का अन्त- सही या गलत

आज उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। धारा 497( व्यभिचार ) को खारिज कर दिया है। जिससे पती पत्नी के बीच तीसरे व्यक्ति को आने की खुली छूट दे दी गयी है। हम भारत में रहते हैं हमारी संस्कृति दूसरे देशों से अलग है। हम शादी को एक अत्यधिक प्रतिष्ठित और महत्वपूर्ण कार्य समझ कर निभाते हैं। हम शादी को भी उतना ही महत्व देते हैं जितना अहमियत हमारे दूसरे रिश्तों को दिया जाता है। इसमें सिर्फ दो भिन्न लोग ही एक नहीं होते बल्की दो परिवार एक हो जाता है। 

शादी और उससे जुड़ी प्रेम, सम्मान तो हमारे देश की संस्कृति हैं यह तो आज सब जानते हैं। लेकिन हमेशा से ही हर रिश्ते में उतार चढ़ाव आये दिन देखने को मिलता है। शायद इसी उतार चढ़ाव के कारण धारा 497 ( व्यभिचार ) बना होगा। हमारे देश में हर इंसान को हर बात पर अपना अपना तर्क देने अथवा रखने की खुली छूट है। इसलिए मैं एक शादीशुदा होने के कारण इस एक्ट को खारिज करने पर उससे होने वाले फायदे अथवा नुकसान पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रही हूं।

पहले धारा 497 के बारे में कुछ अहम बाते बता दूं। यह धारा 497 पूरी तरह से एक तरफा था। जब कोई शादीशुदा पुरुष किसी शादीशुदा स्त्री से सम्बंध रखता था तो दोष साबित होने पर सजा सिर्फ़ पुरुष को ही क्युं दी जाती थी। स्त्री को क्युं नहीं जैसे “ताली एक हाथ से नही बजती” तो फिर सजा एक को ही क्युं? शायद इस धारा 497 को ख़त्म करने के बजाय इसमें कुछ सुधार करने की आवश्यकता थी।

आज के इस विकासशील समाज को बराबरी की आवश्यकता थी। इस पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों की मानसिकता यही थी कि औरतें घर पर रह कर उनके परिवार और बच्चों को संभाले। उनकि गालियाँ सुने किसी से कोई संबंध न रखें। एक नौकरानी अथवा किसी वस्तु की भांति चुपचाप सारे दुखों को सहे। उसे एक बार शादी हो जाने के बाद सारी उम्र उसे चाहे अथवा अनचाहे उस रिश्ते में बंध कर रहना है और उसे निभाना है। भले पुरुष बाहर कितने ही गैरसम्बंध बनाते रहे।और घर की औरतों के हक़ को तार तार करते रहें। इस धारा 497 के ख़ारिज होने से अब पुरुषों में एक डर का एहसास अवश्य ही होगा कि अगर आज वो किसी भी तरह के गैरसम्बंध बनाने के लिए आजाद हैं तो औरतें भी वही करेगी। घर बनाने और बसाने की जिम्मेदारी सिर्फ औरतों की नहीं बल्कि दोनों की है। उच्चतम न्यायालय ने व्यभिचार को असंवैधानिक करार दे कर हमें भी पश्चिमी देशों के साथ जोड़ दिया।

यह तो बराबरी की बातें थी लेकिन क्या यह धारा 497 को पूर्ण रूप से खारिज करना सही था। अब क्या होने की संभावनाएं अधिक है। हमारे देश की शादी जैसे पवित्र रिश्ते को खुले आम मजाक बना दिया। पहले कम से कम कोई इस रिश्ते की मर्यादा का उल्लंघन करने से पहले थोड़ा विचार तो करता था। डर कर ही सही इस रिश्ते की लाज तो बचती थी। लेकिन अब तो पति पत्नी दोनों ही बराबरी से एक दूसरे के विपरीत परिस्थिति उत्पन्न करेंगे । और इसी परिस्थिति में परिवार के बाकी लोगों को कष्ट उठाना पड़ेगा। अब शायद किसी भी परिवार का टुटना और बिखरना आम बात हो जायेगी।


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