धर्म क्या है ! कर्म क्या है !

0
6
धर्म क्या है ! कर्म क्या है !
धर्म क्या है ! कर्म क्या है !

धर्म एवं कर्म को परिभाषित करने का प्रयास हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों से लेकर आज तक हमारे बन्धुगण करते आ रहे हैं | धर्म – कर्म  एक द्वन्द समास है जिसे अलग करके सैद्धान्तिक या व्यावहारिक अर्थ नहीं दिया जा सकता है | कर्म करना धर्म से ही प्रेरित है | धर्म का पालन ही कर्म है |

देश काल परिस्थिति के कारण धर्म के अनुपालनार्थ कर्म का भिन्न – भिन्न तरीका हो जाता है | उदाहरण के लिये कुछ लोग सूर्य को मानते हैं तो कुछ चन्द्रमा को | कोई जन्मा को तो दूसरा अजन्मा को | कर्मो की भिन्नता से पंथ अलग – अलग होते चले गये | जिसे बाद में धर्मो की संज्ञा दे दी गई | बौद्ध, सिख, ईसाई, इस्लाम आदि इसके उदाहरण है | हिन्दू धर्म के नाम से कोई धर्म नहीं है | सनातन धर्म का प्रयोगात्मक शब्द हिन्दू  हो गया है | सभी धर्मो का उद्देश्य एक ही है – सबका कल्याण |

कर्म मनुष्य के द्वारा प्रतिपादित किया जाता है | यह उसके वश में है | महाभारत में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि “कर्म करते चलो” | धृतराष्ट्र अपने पुत्र धर्म निभाने में कर्म से भटक गये | फलतः उनका सर्वनाश हो गया | कर्म के आधार पर ही मनुष्य के खाते में धर्म या अधर्म संचित होता है | धर्म या अधर्म का संचित होना एक स्वतः की प्रक्रिया है | इसी अदृश्य खाते के आधार पर मनुष्य का मुल्यांकन होता है | अच्छे – बुरे में अन्तर हो जाता है | धर्म मानव मुल्यों के रक्षार्थ कर्म करने के लिये उत्प्रेरित करता है | सच तो ये है कि मानव कल्याण की प्राथमिकता को स्वीकार करना ही धर्म है |

अतः सदियों से स्थापित परम्पराओं द्वारा निर्धारित मानव मुल्यों की सर्वोच्च प्राथमिकता को स्वीकार करने के साथ ही उसके रक्षार्थ किये गये निष्काम कर्म को ही धर्म कहते हैं | वास्तविकता में धर्म शाश्वत है और सनातन है | वो द्रष्टव्य नहीं है | उसकी सिर्फ अनुभूति होती है | धर्म के पालन से आत्म संतुष्टि मिलती है जो जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है | अतः धर्म का व्यवहारिक रूप ही कर्म है |


Follow @_India71

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here