दो शब्द औरतों के नाम

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दो शब्द औरतों के नाम
दो शब्द औरतों के नाम

औरत होकर औरत की दशा बताती हूं,
जन्म लिया जिस धरती पर,
उस धरा की व्यथा बताती हूं।
बेटी बन कर जन्म लिया जहाँ
बहन से शुरू हुआ वह कर्तव्य बताती हूं।

औरत होकर औरत की दशा बताती हूं
मायके की कुर्बानी हो या,
हो ससुराल का पुरजोर बताती हूं
जन्म से लेकर मरण तक की हद बताती हूं।
सुख दुःख से भरा यह जीवन,
उस जीवन की गाथा बताती हूं।

औरत होकर औरत की दशा बताती हूं ।
पत्नी बन जो मिला था नवजीवन,
उस जीवन की प्रथा बताती हूं।
कभी पत्नी, बहू तो भाभी बन,
उन नामों की व्यथा बताती हूं।

औरत होकर औरत की दशा बताती हूं ।
खुशियां थी कहां यह मेरी नजरें ढूंढती जिसे,
सागर सी गेहरी गहराईयों का दर्द बताती हूं।
हर नाम की रूसवाई हर काम पर दुत्कारी,
उसी दर्द की व्यथा बताती हूं।

औरत होकर औरत की दशा बताती हूं ।
जीवन था यह मेरा न जाने कितनों का कर्ज दबा,
देते देते बिता जीवन उस जीवन की व्यथा बताती हूं।
औरत जीवन हिमालय से ऊंचा,
जिसके अंदर सागर सी गहराई।
उस दृढ़ता की हद बताती हूं।

औरत होकर औरत की दशा बताती हूं ।
जिस धरा का कर्ज माँ बन कर चुकाती,
वहीं बेटी जनने के लांछन की हद बताती हूं।
बेटी न आये धरती पर ऐसी कोई राह नहीं,
होगी सारी जरूरतें पूरी ऐसी चाह बताती हूं,

औरत होकर औरत की दशा बताती हूं ।
खिलने दो बेटियों के इस बाग़ को,
जिससे मीटेगी पाप इस धरती से, ऐसी राह बताती हूं।
मिलेगी मुक्ति कर्ज चुक जाएगा तुम्हारा,
ऐसे नवजीवन का आधार बताती हूं।
माँ बेटी से बंधा यह धरती इससे सुंदर किसकी हस्ती,
ऐसी खुशियों वाली नवजीवन का शैली बताती हूं,
औरत होकर औरत की दशा बताती हूं ।


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