डाक्टरों की हड़ताल- ममता जी की विकृत मानसिकता

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डाक्टरों की हड़ताल- ममता जी की विकृत मानसिकता
डाक्टरों की हड़ताल- ममता जी की विकृत मानसिकता

डाक्टरों की हड़ताल से जुड़ी कहानी ७५ साल के एक बुढ़े की अस्पताल में मृत्यु के बाद शुरू होती है | ११ जून की शाम मोह. सईद एन आर एस अस्पताल में हार्ट अटैक की तकलीफ को लेकर भर्ती हुआ | उसी समय उसे दूसरा अटैक हो गया | वहाँ उनका सम्बन्धी भी मौजूद थे | डॉक्टर ने शीघ्र इलाज शुरू किया लेकिन रोगी का हार्ट वीट कन्ट्रोल नहीं हो सका और उसकी मृत्यु हो गई | तत्पश्चात उनके सम्बन्धी लोग डाक्टरों के साथ दुर्व्यवहार करने लगे | कुछ देर के अन्दर हीं दो ट्रकों पर सवार उनके समर्थक आ पहुंचे और डाक्टरों पर जानलेवा हमला कर दिया | दो जूनियर डाक्टर सिर और रीढ़ में ईंट और पत्थर की चोट से गम्भीर रूप से घायल हो गये, उन्हें इलाज के लिये दूसरे अस्पताल पहुंचाया गया |

अस्पताल के अन्य डाक्टरों ने अपने घायल सदस्यों ने मारपीट करने वालों को पकड़ने और डाक्टरों की समुचित सुरक्षा व्यवस्था की मांग उठायी और साथ ही अपना विरोध प्रदर्शन प्रारम्भ कर दिया| पुरे बंगाल में चिकित्सा व्यवस्था चरमरा गई | दूसरे दिन बर्धमान और मिदनापुर में वहाँ के  प्रदर्शनकारी डाक्टरों पर आक्रोशित भीड़ ने हमला कर दिया | जगह जगह डाक्टरों ने इस्तीफा देना शुरू कर दिया | प. बंगाल के स्वास्थ्य राज्य मंत्री और स्वास्थ्य निदेशक प्रदर्शनकारी डाक्टरों से मिलने एन आर एस अस्पताल पहुंचे लेकिन डाक्टरों ने उनकी बात अनसुनी कर दी और मुख्य मंत्री से अपनी मांगों के समर्थन के लिये कारवाई की मांग दुहरा दी | मुख्य मंत्री के बयान में देरी से हालात और बिगड़ती चली गई और जब बयान आया वो डाक्टर लोग जो उनसे उम्मीद रखे हुए थे उसका उल्टा हुआ |

जूनियर डाक्टरों को बाहरी कह दिया और काम पर नहीं लौटने पर निष्कासन की धमकी दे डाली | काम नहीं करने वाले जूनियर डाक्टरों को होस्टल खाली कर देने की चेतावनी दी |एन आर एस मेडिकल कालेज के सीनियर डाक्टरों के साथ साथ  वहाँ के प्रिंसिपल और अधीक्षक ने जूनियर डाक्टरों के साथ हुई घटना के विरोध में इस्तीफा दे दिया | प्रदर्शनकारी डाक्टरों के समर्थन में कोलकाता एवं अन्य शहरों के मेडिकल कालेजों और  सरकारी एवं गैर सरकारी अस्पतालों के डाक्टरों का इस्तीफा आना शुरू हो गया और वे सड़क पर भी उतर आये | ओ पी डी  बंद हो गया | उनकी मांगों के समर्थन में अन्य राज्यों के डाक्टर भी सड़क पर आ गये और अस्पताल की सारी व्यवस्थाएं बिगड़ गई | सत्ता पक्ष एवं विपक्ष दोनों की ओर से राजनीतिक बयानबाजी होने लगी | अस्पतालों में मरीजों को ईलाज नहीं मिलने से आम जन आक्रोशित हो उठे |

डाक्टरों की हड़ताल एक अप्रत्याशित दुखद घटनाक्रम का प्रतिफल है | इस घटना से सम्बन्धित एक पक्ष डाक्टरों से बात करने , उन्हें शांत करने के प्रयासों के बजाय ममता की धमकियों ने डाक्टर लोगों को और दुखी एवं आक्रोशित कर दिया | ममता जी के बयानों से वहाँ की चिकित्सा एवं कानून व्यवस्था तो फ़िलहाल प्रभावित हो ही रही है लेकिन उससे पश्चिम बंगाल में आगे की राजनीतिक एवं सामाजिक व्यवस्था में बदलाव के भी संकेत मिल रहें है | ममता बनर्जी ने घटना के लिये बाहरी लोगों को हीं जिम्मेदार ठहराया है |डाक्टरों को बाहरी कहने के पीछे उनका ये इशारा कहीं अपने वोट बैंक की तरफ भी हो सकती है | रोहिंग्या मुसलमान और बंगलादेशी जैसे बाहरी घुसपैठिये ममता जी का वोट बैंक है | उनके संरक्षण से इनकी भौएँ हमेशा तनी रहती है | कानून हो या कोई भी सामाजिक व्यवस्था उन्हें किसी की परवाह नहीं | लोकसभा चुनाव में भाजपा की अप्रत्याशित सीटों पर जीत के कई कारणों में क्या ममता को अपना भी वोट बैंक एक कारण के रूप में दिखाई देनी शुरू हो गई है ? लेकिन विरोधाभास तो तब उठ जाता है जब प. बंगाल में बंगला भाषा की अनिवार्यता तय करना उनको बंगला देश के करीब जाते हुए एहसास कराता है | कहीं केंद्र सरकार की एनआरसी के  विरोध में उनकी ये धमकी तो नहीं | केंद्र की कल्याणकारी योजनाओं को आप नामंजूर करती तो आ हीं रही हैं |

डाक्टरों की पवित्र सेवा भावना को कलंकित कर आपने दूषित मानसिकता का परिचय दिया है जिसका प्रभाव पूरे देश के अस्पतालों की व्यवस्था को हिला कर रख दिया है | “घाव कहीं और चीड़ा कहीं” की विचारधारा से प.बंगाल हीं नहीं देश सकते में है | जल्द हीं कुछ करें कि शान्ति और सामंजस्य स्थापित हो सके और आपकी भी राष्ट्रीय छवि बने |

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