गरीब कौन ?

0
9
गरीब कौन ?
गरीब कौन ?

५० से ५५ साल पहले की बात है हमारे गाँव में बहुत गरीब लोग थे | मेहनत मजदूरी करते थे, उसके एवज में उन्हें धान, मरुआ अनाज दिया जाता था | हमारे यहाँ भी कुछ लोग मजदूरी करते थे | यूँ तो हमारे पास भी कोई ज्यादे जमीन नहीं थी यही ४ से ५ बीघा | वो भी एक जगह नहीं था | ४ से ५ कट्ठा का टुकड़ा, एक आध दो टुकड़ा ८ से १० कट्ठे का था | हमारे गाँव में ९९ % जमीन वालों के पास इसी हिसाब से टुकड़ों में जमीन थी | हाँ मेरा जहाँ घर था वो अभी भी है उससे सटे एक पोखर हमारा ही था अभी भी है | कुल मिला कर बसोबास पोखरा लेकर लगभग २ बीघा है | मैं देखता था मजदूरों को काम करते हुए, हल जोतते हुए और मजदूरी लेते हुए | जिस दिन मजदूरी पैसे में दी जाती थी वो बहुत खुश हो जाते थे |

पर्व त्योहार का जब समय आता था तो मजदूर वर्ग के लोग अपने अपने मालिक से सवैया ड्योढ़ा पर अनाज लेते थे और दुकानों में जाकर उसे बेचते या उसी दुकान से त्योहारों का सामान खरीद लेते थे | सवैया ड्योढ़ा का अर्थ होता था – एक सेर उधर लेने पर सवा या डेढ़ सेर वापस करना | किसी के पास खेती की जमीन लगभग नहीं थी |

पक्का का मकान गाँव में किसी का नहीं था | मजदूरों की कोई बात ही नहीं | हमारा भी मकान कच्चा ही था आज भी वही है | मजदूर वर्ग के यहाँ असमय कोई मेहमान आ जाते तो वे लोग हमारे यहाँ आकर हरी तरकारी माँग कर ले जाते | मेरे बाड़ी झाडी में सालों भर सब्जियाँ उगाई जाती रहती थी | इस तरह वे अपने मेहमानों का स्वागत करते थे |

समय बदलता गया आवागमन की सुबिधा बढ़ी हम और हमारे घर के लोग भी गाँव छोड़ते गए एवं गाँव से लगाव कम होता गया | खेती के लिए हल बैल की जगह ट्रेक्टर आ गया | मजदूरों का रुख शहर की ओर हुआ |

हमलोग भी अब शहर में रहते हैं | गाँव को लकिन छोड़ा नहीं है महीना दो महीना पर सपरिवार गाँव जाते ही हैं | पर्व त्योहार गाँव में ही मानते हैं |

हमारे गाँव की आज की स्थिति को जानिये | हमारा घर जस का तस है उसी को मरम्मत करते रहते हैं | लकिन जिनके पास जमीन नहीं था, घर नहीं था, हम मजदूरों के बारे में बात कर रहे हैं, उन सब का घर पक्के का हो गया है | जिनको नहीं है उनको इंद्रा आवास का मकान है | कोई भी तथाकथित मजदूर सवैया ड्योढ़ा लेने नहीं आता है ऐसे हमलोग भी सवैया ड्योढ़ा देने की स्थिति में नहीं हैं | हमारी खेती नहीं होती है | कारण गाँव में मजदूर नहीं मिलते हैं | जो भी हैं वो बहुत महँगा पड़ता है | जमीन वाले आम लोग अपनी अपनी जमीन उन्ही मजदूरों के परिवारों को बटाई पर दे दिये हैं | हम भी अपनी जमीन उन्हीं लोगों को बटाई पर दे दिया है | जमीन का उपज भी सही से वो लोग नहीं देते हैं | वास्तविकता यह है की जो लोग पहले सवैया ड्योढ़ा पर अनाज लेकर अपना गुजर करते थे आज हम या हमारे जैसे लोग तथाकथित मजदूरों के घर से अनाज खरीद कर खाते हैं | कुछ गिने चुने लोग जिन्हें उम्र बढ़ने के कारण उनके अपने ही बच्चों ने घर निकाला कर दिया है या उनके घर में उनके सिवा और कोई सदस्य नहीं बचा है या जो खुद काम करने के लायक नहीं है उन्हें ही माँग चांग कर गुजारा करना पड़ता है |

आप हमारे गाँव आईये और देखिये | हमलोग गाँव जाते हैं और साफ़ सफाई या बाड़ी झाड़ी साफ़ करवाना रहता है उसके लिए काफी मसक्कत करना पड़ता है | मजदूर हमारे यहाँ काम करने नहीं आयेंगे उनको फुर्सत नहीं है | जिनसे आपको नजदीकी सम्बंध है और उनका अगर मन मान गया तो आकर बाड़ी झाड़ी साफ़ कर देंगे |

जो पहले भोजन की व्यवस्था में दिनभर जुटे रहते थे आज उनके घर दैनिक उपयोग की आधुनिक वस्तुयें उपलब्ध है | जमीन भी वही लोग खरीदने के इक्षुक रहते हैं और खरीदते भी हैं | कारण परिवार के कुछ सदस्य बाहर काम करते हैं | एक – दो गाँव में रहते हैं जो खेती बाड़ी से लेकर घर की भी रखवाली करते हैं | महिला पुरुष और बाल बच्चे गाँव में रहें या शहरों में सब काम करते हैं | इस तरह इनकी आमदनी काफी हो जाती है | अलावे इसके सरकार की ओर से भी इन्हें ३/- रूपये किलो चावल और २/- रूपये किलो गेहूं मिल जाता है यानी १००/- रुपये में महीने भर का अनाज उपलब्ध हो जाता है |

उनलोगों के पास बस कमी है तो सिर्फ पढाई लिखाई की | इस कमी होने का भी उनके पास दमदार तर्क है | उनकी सोच में बच्चा ८ से १० वर्ष का होने पर कमाना शुरू कर देता है | पढ़ेगा लिखेगा तो २० से २२ वर्ष के बाद ही कुछ कमाना शुरू करेगा | १० से २० वर्ष की आयु होने तक बच्चा जितना कमा लेगा वो २० से २२ वर्ष की आयु से कमाने वालों से अधिक होगा | जमाना पैसों का है, पैसा होना चाहिये | क्या जरुरत है पढने की, मेहनत मजदूरी सभी करते हैं, पढ़े लिखे लोग भी करते ही हैं |

हम सरकारी सेवक हैं | हल बैल नहीं जोत सकते और न हीं छुट्टियाँ हैं | खेती बाड़ी करने के साथ साथ नौकरी संभव नहीं है | इसका नाजायज लाभ गाँव के तथाकथित मजदूर वर्ग लेते हैं | हम शहर में रहते हैं हमारे नाम से गैस कनेक्शन शहर में है | गाँव आने पर खाना बनाने के लिये लकड़ी का इंधन उपलब्ध करना पड़ता है | मेरा बच्चा शहर के कान्वेंट स्कूलों में पढता है स्कूल की फीस, बस किराया, स्कूल ड्रेस से लेकर किताब पर काफी खर्च आता है | उन मजदूरों को कोई खर्चा नहीं है सिर्फ आमदनी है | एक परिवार में यदि पांच सदस्य हैं उनमे से एक की आमदनी से परिवार का गुजरा होता है बाकी चार सदस्यों की आमदनी बचत है | गाँव की जमीन की उपज का अधिकांश  लाभ सीधा या परोक्ष रूप से वही लोग उठाते हैं | उनके पास घर है पैसा है अनाज है तो जरा बिचार कीजिये – गरीब कौन है |

Follow @_India71

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here