जनसंख्या पर नियंत्रण, खुशियों को करे आमंत्रण

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जनसंख्या पर नियंत्रण, खुशियों को करे आमंत्रण
जनसंख्या पर नियंत्रण, खुशियों को करे आमंत्रण

हमारे समाज की अजीब व्यथा है। लोगों के करनी और कथनी में बहुत अंतर है। आज की स्थिति यह है कि पूरे के पूरे देश पर संकट में आ जाये, लेकिन हमारे देश की जनता यह मानने को तैयार नहीं की उनके द्वारा भी कोई गलती हुई होगी। सारे के सारे देश वाशियों का एक ही मंत्र है “हमने क्या किया या एक हमारे कुछ करने अथवा कहने से देश को क्या फर्क पड़ेगा “। 

हमारे देश में बढ़ती आपराधिक मामलों की मुख्य वजह क्या है? आपराधिक प्रवृत्ति क्युं अथवा कैसे जन्म लेती है? इस तरह के कई सवाल हमेशा हमारे इर्द गिर्द घूमती रहती है। लेकिन यह शायद ही कोई समझता है। अथवा बोल सकते हैं कि कोई भी समझने की कोशिश ही करता होगा। अनियंत्रित जनसंख्या जो इस कदर आज हमारे देश में बढ़ती जा रही है। मानो जैसे “बाढ़ का पानी चारों ओर फैल कर सब कुछ तबाह बर्बाद कर देती है”। जहां नजरें जाये वहीं कोई न कोई परेशानियां। न जाने हम कितने ही दिक्कतों के चक्रव्यूह में फंसे हुए हो। इन कठिनाईयों से निकलने का कोई रास्ता ही नहीं समझ में आता है। आये भी कैसे जब जनसंख्या नियंत्रण मामले में कोई भी व्यक्ति अथवा संस्था बात भी नहीं करना चाहते हैं। वो चाहे हमारे राजनीतिक दल के सदस्य हों या कोई फिल्मी कलाकार। इस विषय पर कभी किसी ने अपनी कोई प्रतिक्रिया ही व्यक्त नहीं किया। जब इनको देश के खिलाफ कुछ बोलना रहता है तो यही लोग अपना विडियो बना बना के देश में असहिष्णुता फैलाने में लग जाते हैं। आज तक न ही जनसंख्या नियंत्रण पर न कोई फिल्म बनाई गई न ही किसी प्रकार का कोई कार्यक्रम ही आयोजित किया गया है कभी। फिल्मी कलाकारों को शायद यह लगता है कि ऐसे कार्यक्रमों से उनका नुकसान होगा उनकी फिल्मों के प्रदर्शन उनकी कमाई कम हो जाएगी। उनके कमाई का साधन पर असर पड़ेगा ऐसे में यह लोग अपनी चिंता करेंगे या देश की। जहां सारी दुनिया स्वार्थी हो वहां किसी से क्या उम्मीद करना। खैर यह तो निजि संस्था वाले हैं इनको क्यूँ हो देश दुनिया की परवाह।

लेकिन सरकार! जिनको हम चुनते हैं जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हमारे पैसों से ही देश के लिए कुछ भी करते हैं। वो क्यों नहीं जनसंख्या नियंत्रण पर कोई कानून बनाते हैं? कारण यह है कि सरकार भी सत्ता के सागर में डूबी हुई है। सरकार भी यही चाहती है जनसंख्या में वृद्धि होती रहे और हमारे मतदाताओं में बढ़ोतरी होती रहे। हम इसी तरह से देश पर शासन करते रहें। लेकिन अब सरकार को अपनी यह नीति बदलनी पड़ेगी अब सरकार को अपना निजी स्वार्थ को न देख कर सिर्फ़ देश के विकास के लिए तत्परता से काम करना पड़ेगा। जनसंख्या पर नियंत्रण करने के लिए कोई न कोई कानून बनाना पड़ेगा। तब शायद जनसंख्या के कारण किसी प्रकार की कोई परेशानी उत्पन्न नहीं होगी। तब शायद हमारे देश की जनसंख्या भी उसके आय के हिसाब से ही हो। खैर यह तो कानूनी मसले थे । 

लेकिन हमारे देश की जनता भी कोई कम नहीं हैं! ऐसे लोगों को भी देख लीजिये। जब भी इनकी किसी भी प्रकार की जरूरतें पूरी नहीं होती तो वह सरकार की ओर आस लगाती है। किसी को पढ़ाई के लिए सहायता चाहिये या किसी को दो समय भोजन की व्यवस्था न हो। किसी को मनचाहा रोजगार न मिले या किसी के पास आवास न हो, फसल न उपजे या नष्ट हो जाये, व्यापार में हानि हो या हो जाये कोई दुर्घटना, सारी की सारी भरपाई सरकार के जिम्मे। आखिरकार हम क्यूं अपनी जरूरतों के लिए सरकारी सहायता का इंतज़ार करते हैं। कभी कर्ज माफी के नाम पर तो कभी आरक्षण के नाम पर कभी जरूरतों के नाम पर तो कभी हादसों के नाम पर। सारी जरूरतों को सरकार ही क्यों पूरा करे। अपने मुश्किलों का सामना हमें स्वयं ही करना चाहिए। उनको समाप्त करने के रास्ते हमें खोजने हैं। 

यह तो हम भी बखूबी जानते हैं कि हमारी स्थिति क्या है? हम अपनी कमाई से परिवार के कितने सदस्यों की भरण पोषण कर सकते हैं अथवा किसकी जरूरत किस हद तक पूरा कर सकते हैं। क्यूं न हम उसी हिसाब से जनसंख्या में इजाफा करें। जिससे हमे भी उनकी परवरिश में कठिनाई न हो अथवा किसी के सामने हाथ भी नहीं फैलाना पड़े। हमारे घरों में रोटी एक होती है लेकिन उसके हिस्सेदार कई होते हैं। अगर हम थोड़ी सी समझदारी से अपनी जिम्मेदारियों को समझे तो किसी भी परिवार में कभी भी रोटियों की कभी कमी न हो।हर सदस्य को समान रूप से भोजन वस्त्र रहने के लिए आवास दे सकेंगे। हम अपने घर के सभी सदस्यों को सही मायने में उनको सही परवरिश, सही संस्कार दे सकेंगे। आपराधिक मानसिकता वाली सोच पर संयम लगा सकेंगे। भले ही हम देश के विकास में सहायक नहीं बन सकते हों तो कम से कम रुकावट तो नहीं बनेंगे। 

आज अगर हम जनसंख्या पर नियंत्रण कर लेते हैं तो अपने साथ अपनों के भविष्य को भी सवार पाएंगे । उनकी जरूरतें पूरी कर सकेंगे तो वो गलत तरीके से बाहर में कमाई के प्रावधान नहीं खोजेंगे। अथवा घर में हिस्सेदार कम होंगे तो स्वभाव में एक दूसरे के प्रति करवाहट भी कम होंगे। जरूरतें जरूरत के मुताबिक होगा तो सोच में तरक्की होगी। एक नये और विकास शील देश की स्थापना करने में सभी लोग अपना अपना सहयोग दे सकेंगे। जिन्दगी को सही मायने में जी सकेंगे हरेक परिवार में खुशियां होगी सुकून भरी जिन्दगी होगी।


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