कर्म ही आस्था हैं

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कर्म ही आस्था हैं
कर्म ही आस्था हैं

एक ऐसी घटना याद आ रही हैं जो सोचती हूँ आप सबके साथ शेयर करू। कुछ लोगों का कहना है कि ईश्वर है और कुछ का कहना है कि ये हमारी कल्पना मात्र है। लेकिन मेरा मानना है कि ईश्वर का होना अथवा नहीं होना हमारी आस्था से जुड़ी हुई है जब हम कुछ पाने की इच्छा बड़ी ही शिद्दत से करते हैं तो देरी हो या जल्दी पूरी होती जरुर है। बस उसको पाने की इच्छा साफ ओर पवित्र मन से होनी चाहिए।

ऐसा नहीं है कि हमारे द्वारा किए गए सारे कर्म अच्छे ही होते हैं या हम सारे काम साफ मन से ही करते हैं। हमारे अंदर भी हर तरह के विचार उत्पन होते हैं जो कि कभी अच्छा ओर कभी बुरा होता है। लेकिन फिर भी हम जब किसी चीज़ को पाने की इच्छा तहे दिल से करते हैं तो वो पूरी होती जरुर है।

वैसे तो हमारे आसपास ऐसी कई घटनाएं होती हैं जो कि हमें ईश्वर की आस्था से जोरता है लेकिन एक ऐसी इच्छा होती है जिसको पाने के लिए हर कोई कभी न कभी या कहीं न कहीं ईश्वर से जुड़ता जरुर है वह है संतान की प्राप्ति कोई पुत्र के लिए इच्छुक हैं तो कोई पुत्र ओर पुत्री दोनों के लिए लेकिन संतान की इच्छा हर कोई करता है।लेकिन इस इच्छा को पूरा करने के लिए अगर हम गलत तरीके अपनाते हैं तो निश्चित ही ईश्वर उसका भी फल इसी धरती पर देते हैं हम येही से सब कुछ भोग के जाते हैं

एक नया शादी शुदा जोड़ा बड़े ही शिद्दत से संतान के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं रोज मंदिरों में जाते हैं कुछ समय बाद पत्नी गर्व वती होती है कुछ महीनों बाद एक पुत्री को जन्म देती है। दोनों बहुत खुश होते हैं लेकिन बेटे की आस बनी ही रहती है  कुछ समय बाद फिर पूजा पाठ में जुड़ जाते हैं। इस बार मन में बेटे की आस रहती है पत्नी फिर गर्वबती होती है लेकिन इस बार सायद ईश्वर पर विश्वास कम था जिस कारण लिंग प्रशिक्षण करने की सोची। समय आने पर लिंग प्रशिक्षण भी किया लेकिन इस बार भी कन्या ही निकली। इस बार उस कन्या को गर्व मै ही मार दी जाती है और इसका उनको तनिक भी अफसोस नहीं है। समय बीतता गया वो फिर ईश्वर की आराधना में अपना सारा ध्यान ओर समय लगाने लगे। कुछ समय बाद फिर उसकी पत्नी फिर गर्भबती हुई। समय आने पर फिर लिंग प्रशिक्षण किया इस बार पुत्र था ऐसा समाचार मिला। लेकिन शायद इश्वर इस बार उस भ्रूण हत्या का भी न्याय करते हैं और संजोग से जिस अवस्था में भ्रूण हत्या किया गया था उसी अवस्था से उस पुत्र को लिंग संबंधित परेशनियो का पता चला। दूसरे शहरों में जा कर इलाज कराना परा। और ये शीलशिला चलता रहा फिर बच्चे ने जन्म लिया। लेकिन उसकी तकलीफ बढ़ती ही गयी. दोनों का समय दस दिन घर में तो बीस दिन हस्पताल में बीतने लगा। बहुत दुखी होने के बाद सहसा उन्हें मानो अपनी उस गलती का एहसास हुआ। ओर वो ईश्वर से उस गलती की माफी सच्चे मन से मागी।

पश्चाताप ही सबसे बड़ी माफी होती है। ओर येही पछतावा उनके ओर उनके पुत्र के लिए सुकून था धीरे धीरे उनका बेटा ठीक होने लगा। करीब पांच साल लग गया काफी हद तक स्वास्थ होने में।

इससे तो यही पता चलता है कि हमारी इच्छा शक्ति ही हमें आस्था की ओर लेके जाति हैं। हमारे कर्म ही हमे अच्छा या बुरा फल देती है।

           “कर्म ही आयना है, किस्मत की लकीरों का
            आस्था ही भरोसा है अच्छे बुरे तकदि‍रों का
            जिंदगी हैं शीमित, आशाएँ हैं बड़ी
            जिनको पूरा करने में हमशे
             हो न जाएँ ग़लती कोई।”

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