किसान भी अपने को समझें !

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किसान भी अपने को समझें !
किसान भी अपने को समझें !

भारतीय नागरिकों को यदि वर्गीकृत किया जाय तो सबसे बड़ा वर्ग किसानों का है | किसान देश के जिम्मेदार नागरिक हैं | भारत किसानों का देश कहा जाता रहा है | उन्हें अन्नदाता भी कहकर संबोधित किया जाता है | देश के विकास में उनकी जबरदस्त भूमिका है | लकिन आज वही समस्याग्रस्त है | आये दिन ख़बरें मिलती रहती है कि कृषि ऋण में डूबने के कारण अमुक किसान ने आत्महत्या कर ली है | अतः आवश्यक है की उनकी समस्या, उसके कारणों एवं निदान पर विचार किया जाय | सबसे पहले किसानों को हमें समझना होगा | एक किसान वो है जो खुद खेती करते हैं और दूसरा वो जो खेती करवाते हैं और खुद भी करते हैं | जो खुद खेती करते हैं अर्थात छोटे किसानों की संख्या दुसरे से खेती करवाने वाले किसानों अर्थात बड़े किसानों से बहुत अधिक है | छोटे किसानों की स्थिति बड़े किसानों की अपेक्षा ज्यादा ख़राब है |

छोटे किसान एवं कृषि मजदूर बड़े किसानों की जमीन बटाई पर लेकर खेती करते हैं | बाढ़ या सुखाड़ की स्थिति में सरकार द्वरा दी जाने वाली राहत इन छोटे किसानों तक सही ढंग से नहीं पहुँच पाती है |   राहत उन्हीं किसानों को मिलता है जो अपनी जमीन का रेंट रिसीट एवं खेत में खड़े होकर अपना फोटोग्राफ खीँचवा कर सरकारी कार्यालय में जमा करते हैं | इस मामले में छोटे किसान जो बड़े किसान की जमीन बटाई पर लेते हैं, मारे जाते हैं | बटाईदार को दोहरी मार लगती है, एक तो खेती पर खर्च और दूसरा सरकार द्वारा दी गई राहत से वंचित रहना |

पहले किसान कृषि को अपने पेशा के रूप में मानते थे | आज किसान खेती को जीविका का साधन मानते हैं | फर्क आया है | पेशा के रूप में उन्हें सरकार को टेक्स देना पड़ेगा | लकिन आज उन्हें ‘कर मुक्त’ कर दिया गया है | इसके अतिरिक्त सरकार द्वारा उन्हें तरह-तरह के लाभ जैसे खाद बीज पर सब्सीडी, कृषि उत्पाद का समर्थन मूल्य पर सरकार द्वारा खरीदना, बाढ़ या सुखाड़ की स्थिति में राहत एवं अल्प ब्याज पर कृषि ऋण मुहैया कराया जाता है | फलतः कृषि उत्पाद पहले की अपेक्षा बहुत बढ़ गया है | फिर भी वो अभावग्रस्त हैं | बड़े किसान भी कमोवेश ऐसे ही हैं |

पहले भी उपभोक्ता बाज़ार पहुँचते थे आज भी वो बाज़ार पहुँचते हैं | पहले और आज के बाज़ार में अंतर है | आज किसानों के सारे उत्पाद एक ही जगह मिल जातें हैं | पहले बाजारों में किसान खुद अपना सामान बेचते थे | आज के बाज़ार से किसान नदारत हैं | किसान के यहाँ से माल बाज़ार में लाने वाला कोई और है | माल की कीमत बाज़ार में पहुँचते-पहुँचते कई गुणा बढ़ जाता है जिसका फायदा किसान को नहीं मिलता है |

आज किसान खेती से बिमुख होकर शहर में नौकरी या कोई कारोबार के प्रति आकर्षित हो गए हैं | वो खेती को अपना पेशा नहीं समझते हैं | यह एक गम्भीर मुद्दा है जिस पर ध्यान देने की जरुरत है | उनकी कर्ज माफ़ी या सरकार का समर्थन मूल्य देना आदि इसका समाधान नहीं है | किसान को आज खुद सामर्थवान बनना या बनाना जरूरी है| कांग्रेस द्वारा 2008 में किसानों का कर्ज माँफ किया गया था जिसकी बदौलत कांग्रेस 2009 में फिर सत्ता में आई | 2019 के चुनाव से पहले फिर कर्ज माँफी का मुद्दा जोर-शोर से उठाया जा रहा है | उनको पता है की कर्ज आज नहीं तो कल माँफ होना ही है | इसलिये वे कर्ज चुकाने का प्रयास ही नहीं करते हैं | वे कर्ज चुकाने की जबावदेही से मुकरते दिखाई पड़ते हैं | आज किसानों की समस्या देश की बड़ी समस्याओं में से एक है |

सरकार की नीति एवं किसान के बीच की दुरी बढ़ गई है | सरकार की नीतियों को किसानों तक पहुँचने के लिये कई दरवाजे से गुजरना पड़ता है जिससे किसानों को पूर्ण लाभ सही समय पर नहीं मिल पाता है | उनके उत्पाद को भी बाज़ार में पहुँचने के लिये कई रास्तों को पार करना होता है | फलतः उनको बाज़ार के विक्री दर का लाभ उन्हें नहीं मिल पाता है | कच्चे उत्पाद में तो उनकी परेशानी और बढ़ जाती है | सही समय से नहीं बिकने की स्थिति में कच्चा उत्पाद सड़ने लगता है | इससे उनको ज्यादा नुक्सान होता है | उत्पाद का मूल्य बाज़ार में “मांग एवं आपूर्ति” पर निर्भर करता है | किसानों को अपने उत्पाद का मूल्य स्वयं निर्धारित करने दिया जाना चाहिये | अपना माल वो खुद बाज़ार ले जाये तो ज्यादे लाभकारी होगा |

सरकार को चाहिए कि वे कृषि को बढ़ावे के लिये बिजली – पानी की व्यवस्था करें | आवागमन की सुविधा बढाये | खाद-बीज आसानी से उनको उपलब्ध हो जाय | बाढ़ एवं सुखाड़ से निदान पाने के लिये नदियों से नहर निकालकर गाँव-गाँव पंहुचा जाय | तत्पश्चात कृषि यंत्र के लिय ऋण भी उपलब्ध करवायी जाय लकिन उसकी सख्ती से वसूली की जाय | उनके उत्पादों की विक्री के लिये जगह-जगह बाज़ार के प्रबंध किये जाँय | बाज़ार के स्तर के आलोक किसान अपना माल वहाँ ले जायें | उन्हें अपने उत्पाद की कीमत खुद तय करने दिया जाय | विक्री दाम पर समयानुक्रम में जि० एस० टी० निर्धारित किया जाय | इन उपायों से उनकी कृषी में रूचि आयेगी, वे इस पेशे  को फायदेमंद समझेंगे और इस तरह देश की सेवा भी कर सकेंगे | साथ ही देश के विकास में अपनी भागीदारी भी सुनिश्चित कर पायेंगे |

          “जय जवान जय किसान जय विज्ञान

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