किसानों की दशा दिशा

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किसानों की दशा दिशा
किसानों की दशा दिशा

आज अगर  पूरे देश में अत्यधिक दयनीय स्थिति किसी की है तो वह हमारे किसानों की है। यह बात तो हर कोई जानता एवं मानता है कि हमारे जीवन का आधार भोजन है। हम अपने जीवन में कोई भी काम करते हैं, सही, गलत, अच्छा, बुरा वह सब कुछ प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से भोजन से ही जुड़ा होता है।

आज इसी अनाज को उपजाने वालों के जीवन की स्थिति इतनी दयनीय हो गई है कि वह चाह कर भी खुद से खुद की दशा दिशा को सुधार नहीं पा रहे हैं। जिस कारण ग़रीबी, दिक्कत, अनदेखी जैसे कारणों से अपने पूरे परिवार को संकट में छोड़ कर आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते हैं। इतना बड़ा फैसला अगर कोई इंसान करता है तो आप ही सोचिए कि उसकी मनोदशा कैसी होगी।

कुछ ऐसे ही तथ्यों को आपके सामने रखने की कोशिश कर रही हूं। किसानों की स्थिति वैसे तो कई कारणों से दयनीय है जिनमें से कुछ है। पहला यह कि अधिकतर किसान गरीबी रेखा से अत्यधिक नीचे हैं जिस कारण वह जमींदार या साहुकार के खेतों में रोज या बटायी के तौर पर काम करते हैं। जिसमें या तो रोज की मजदूरी मिलती है या फसल का आधा हिस्सा मिलता है। मजदूरी  पर कैसे जीवन चलता है यह तो सभी जानते हैं। बाकी बचा मजदूरी के नाम पर आधा फसल जिसका आधा भाग बीज के लिए रखना पड़ता है। बचे हुए भाग से रोज की सारी जरुरतों को पूरा किया जाता है। उसी से पूरे परिवार की जीविका चलती है।

दूसरी बात अगर खुद की जमीन है तो उस पर खेती करने के लिए बीज, खाद, खेत जोतने की सामग्री इन सब को पूरा करने के लिए किसी न किसी से कर्ज लेना पड़ता है। फसल नष्ट हो गयी तो भगवान मालिक है। अगर फसल हुई तब भी कोई खास सुधार की उम्मीद नहीं होती क्यूंकि उनको लूटने अथवा ठगने के लिए बिचौलिये बैठे ही रहते हैं। वह इन किसानों को झूठी सरकारी दाम बता कर जोड़ जबरदस्ती सस्ते दामों पर इनका अनाज खरीद कर निकल जाते हैं। जिससे न तो किसान कर्जा ही चुका पाते हैं और न अगली बार की तैयारी ही ठीकठाक से कर पाते हैं। जिस कारण कभी अपने इस कर्ज और दुःखों से निकल ही नहीं पाते हैं।

तीसरी और सबसे भयानक तकलीफ होती है कुदरती हमला जो ना तो टाली जाती है, न सही जा सकती है। इंसानों द्वारा दिया गया दर्द सहा जा सकता है लेकिन प्राकृतिक विपदाओं को झेलना अथवा सहना बहुत मुश्किल होता है। कभी कहीं सूखा कि स्थिति हो जाती है तो कहीं बाढ़ सबकुछ डुबो देती है। हर हाल में भुगतना किसानों को ही पड़ता है।

इन जैसे और न जाने कितने समस्याएं होंगी जिससे किसानों को आये दिन सहना पड़ता होगा। इन सबके बावजूद अगर सरकार थोड़ी सी विचार करे तो उनके दशा दिशा में सुधार कर सकती है। आज उनके अनाज आम आदमी तक बिचौलियों के द्वारा पहुंचता है। जिस फसल को 5रू के दर से खरीद कर हमें 50रू में बेचते हैं और फसल का सारा मुनाफा बिचौलिये ले जाते हैं। ऐसी स्थिति में अगर सरकार अपने दाम पर किसानों को उनके फसल की पैदावार का पूरा मुआवजा दे तो शायद उनकी स्थिति में कुछ हद तक सुधार की जा सकती है।

किसी का कर्जा माफ कर देना या उसे कुछ दे देना यह किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। बल्कि किसानों के सम्मान की रक्षा करते हुए उनके आत्म सम्मान के साथ जीने की व्यवस्था कराना ही असली मदद होती है। किसानों को यह एहसास दिलाने की जरूरत है कि वह कोइ मामूली इंसान नहीं है। किसान है तो हमारा जीवन है, देश का अस्तित्व है। हमारे देश को जितनी आवश्यकता एक वैज्ञानिक की है उतनी ही जरूरत किसानों की है। किसानों से पूरे देश की व्यवस्था जुड़ी है। 

इसीलिए हमारे पूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने भारत को “जय जवान जय किसान” जैसा अचूक  नारा दिया था।
 

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