कुछ पंक्तियाँ चुनावी चकाचौंध पर

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कुछ पंक्तियाँ चुनावी चकाचौंध पर
कुछ पंक्तियाँ चुनावी चकाचौंध पर

हर तरफ एक ही बात, उलझनों में उलझी चुनावों की रात। 
कही सरकार को है उलझन, कहीं विपक्ष बना सरदर्द। 
जनता उलझी हर बार, बातों और वायदो में। 
इसकी सूने उसकी सूने, राजनीति के चकाचौंध में। 
न दिमाग़ चले न दिल माने इन उलझनों में 
फसता ही जाये वायदों के जुस्तजू में 
हर तरफ एक ही बात उलझनों में उलझी चुनावों की रात ।
वो आया ये गया और हर बार मन को छल गया। 
जाने मन ये मेरा हर बार तेरे बहकावे में क्यों ढल गया। 
हमने भी देखा फायदा, तुमने भी देखा फायदा। 
फायदों के बीच ये, आ गया कैसा फासला। 
हर तरफ एक ही बात उलझनों में उलझी चुनावों की रात 
कही अधिकारों का हनन, कहीं उलफतों का भरम 
सब खींचे अपनी ओर बनाने को एक धरम। 
लड़ने के लिए मिलें हैं कई बहाने फिर भी थामे हुए हैं, 
सब क्यूं लिये अपने अपने फसाने। 
लड़ने का है मुद्दा अनेक, फिर क्यूँ बनाया धर्म और जात। 
हर तरफ एक ही बात, उलझनों में उलझी चुनावों की रात ।
चुनावों में चलती है वायदों की फूलझड़ी 
कहीं बातों में संजीदगी, कहीं विवादों में बंदगी । 
कहीं आरोप प्रत्यारोप बना मक़सद का आयना । 
कहीं अपनों का छोड़ा साथ गैरों से जा मिला। 
कितनी बेरूखी बन गई चुनावी बिसात
हर तरफ एक ही बात उलझनों में उलझी चुनावों की रात ।


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