क्या आप अपने बच्चों से पूछ सकते हैं…………?

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क्या आप अपने बच्चों से पूछ सकते हैं............?
क्या आप अपने बच्चों से पूछ सकते हैं............?

आपके बच्चे क्या खायें, क्या पीयें, क्या पहने, क्या बोले, कहाँ घूमें, कब घर से निकले, कब लौट के आयें, किससे मिलें, क्यों मिले, क्या लिखे, क्या पढ़े कानून तो इसके सम्बन्ध में नहीं पूछ सकता है क्योंकि ये सारी चीजे निजता है जो मौलिक अधिकार के अन्तर्गत आता है | आपको इस सम्बन्ध में पूछने का हक है या नहीं आज यह एक विचारणीय प्रश्न है |

दिल्ली की दो घटनाओं ने तो माता-पिता एवं पुत्र के बीच के रिश्ते को तार-तार कर दिया है | पहली घटना ये है कि पुत्र ने अपने पिता की हत्या इसलिये कर दी क्योंकि पिता क्रिकेट की बाजी में ढेरों पैसे डूबा चुके थे और अपने पुत्र की जमानत नहीं ले सके | दूसरी घटना यह है कि पुत्र ने अपने माता-पिता एवं पन्द्रह वर्षीय बहन को इसलिये मार डाला क्योंकि पढ़ाई नहीं करने के कारण उसे ताना सुनना पड़ता था, झिड़की खानी पड़ती थी | ये दोनों ही घटनाएं दो-तीन दिनों के अन्तराल पर आज-कल में हुई है | प्रायः ऐसे वारदात आये दिन देखने एवं सुनने को मिलता है | इसके रोकथाम का कोई उपाय है या नहीं इस पर विचार करने से पहले हम घटना से जुड़ी माता-पिता के जीवकोपार्जन से सम्बन्धित कार्य पर गौर करें | पहली घटना के सन्दर्भ में पहले ही कहा गया है कि बेटा का बाप जुआरी था | दूसरी घटना में पुत्र की माँ एक एन. जी. ओ. (जो महिला सशक्तिकरण के लिये काम करता है) में काम करती थी तथा पिता लेबर कांट्रेक्टर के साथ-साथ उत्तर भारतीय लोधी राजपूत संघ का चेयरमैन था | पुत्र प्रथम वर्ष इंजीनियरिंग का छात्र है |

कार्यरत पति एवं पत्नी अपने छोटे बच्चे को प्यार नहीं दे पाते हैं जितना बच्चे को चाहिये | बच्चे को व्यस्त रखने के लिये या यूँ कहें कि माता-पिता घर गृहस्थी से लेकर अपनी नौकरी या व्यवसाय में लगे रहने के कारण उसे तरह-तरह के खिलौने लाकर दे देते हैं | जिनके घर में कोई दूसरा नहीं होता ऐसे माता-पिता अपने बच्चों को प्ले स्कूल में डाल देते हैं | वहाँ भी उन्हें खिलौना से खेलना पड़ता है | हमउम्र के बच्चों के साथ रहना, खेलना होता है | वे आपस में अपने सुख-दुःख भी बाँटते हैं जिसे हम आप नहीं समझ सकते हैं | प्ले स्कूल की शिक्षिका / सेविका से कभी-कभी डांट भी सुननी पड़ती है | ऐसे बच्चों में एकाकीपन तो बचपन याने दो साल से चार साल तक के जीवन में ही उत्पन्न हो जाता है | खिलौने के रूप में ही सही बन्दूक, पिस्टल, गोली, मोबाइल आदि की विशेषताओं से तो वे अवगत हो ही जाते हैं | ऐसे बच्चे में स्वयं अपने दम पर अपना जीवन व्यतीत करने की क्षमता उत्पन्न होने लगती है |

माता-पिता को यह जानना जरुरी है कि बच्चों की सीखने की क्षमता हम-आप से ज्यादा होती है | वह गर्भ से ही सीखना प्रारम्भ करता है | माता-पिता, घर का माहौल आदि से वो गर्भ से ही परिचित रहता है | गर्भ में सीखने का माध्यम बच्चे की माँ की इन्द्रियाँ होती है | जन्म के बाद वही बच्चा अपनी आँख-कान से देखकर-सुनकर घर की हर गतिविधि को समझता है | इसी क्रम में सबसे पहले वो माँ-बाप एवं घर में अन्य लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा सीखता है | याद रहना चाहिए कि जन्म जात बच्चे को बोलना सिखाने के लिये ट्यूटर नहीं रखना पड़ता है | गर्भ की अवधि से लेकर ६ साल तक की उम्र में ही बच्चे की मानसिकता में हर अच्छी-बुरी चीज का भाव (sense) आ जाता है | वही समझ (sense) बढ़ती उम्र के साथ विकसित होता जाता है | उस में बदलाव की सम्भावनाएं कम होती है | परिस्थितिजन्य कारणों से थोड़ा बहुत बदलाव आ सकता है लेकिन उस के लिये पारिवारिक एवं सामाजिक परिवेश महत्वपूर्ण होता है | यह जान लीजिए साथ ही मान लीजिये कि ६ वर्ष तक की उम्र में ही बच्चा अपने आगे की जिन्दगी का भविष्य खुद तय कर लेता है | अतः इस अवधि में बच्चों को अच्छे वातावरण पेश किये जायें | उसके सामने अच्छी बाते करना, उसके साथ समय व्यतीत करना बहुत मायने रखता है | बच्चे की छोटी-छोटी गलतियों पर ज्यादे ध्यान देने की जरूरत नहीं होती है | उनकी गलतियों को हँस कर सही करने का प्रयास होना चाहिये | बच्चा जो कुछ गलत कर रहा है आप उसे मना करेंगे तो वह उसी गलतियों को बार-बार दुहरायेगा | यदि आप कहेंगे ‘ये काम करो’ बच्चा वो काम नहीं करेगा | यह बच्चों में जन्म जात मानसिकता होती है | यदि हम-आप बच्चों के लिये समय नहीं बचा पाते हैं तो हमें उनसे उम्मीद कम करनी चाहिए | वैसे किसी के भाग्य को कोई नहीं जानता है |

उपर्युक्त परिपेक्ष्य में आप खुद तय करें कि आप को अपने बच्चों से पूछने का अधिकार है अथवा नहीं |


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