लोग क्या कहेंगे?

0
4
लोग क्या कहेंगे?
लोग क्या कहेंगे?

लोग क्या कहेंगे ये सिर्फ एक सोच नहीं है, ये हमारी जिंदगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। आज के समय में जिस भी इंसान पर यह सोच हावी हो जाता है वो इंसान अपना कोई भी काम पूर्ण रूप से कर ही नहीं पाता है। किसी भी काम को करने से पहले वो ऐसी कयी धारणाएँ बना लेता है कि लोग क्या कहेंगे। जिस कारण से हम अपना और अपनो का भूत भविष्य और वर्तमान सब तबाह कर देते हैं। लोग क्या कहेंगे ये सोच जब एक पिता पर हाबी होता है तो क्या होता है।

एक शहर में एक मध्यम वर्ग का एक परिवार रहता था। परिवार में माता पिता और दो बच्चे बेटा 13 साल का बेटी 10 साल की। पिता पेसे से दरोगा था जो कि काफी प्रतिष्ठित व्यक्ति था। जिस कारण अपने घर में कुछ अधिक ही अनुशासन व्यवस्था कर रखी थी। हर बात पर परिवार को अनुशासित करने में लगे रहते थे, हर वक़्त ये ही कहते रहते की ये न करो वो न करो यहां मत जाओ वहां मत जाओ वगेरा वगेरा।

जब एक पिता सोचने लगता है कि मै एक दरोगा हूँ, मेरी अपनी एक पहचान है मेरे घर में कोई कुछ गलत कहेगा या करेगा, तो लोग क्या कहेंगे? मै जब अपने घर परिवार को नहीं संभाल सकता तो दूषरों को कैसे संभालूंगा। इसी सोच को अपनी जिंदगी पर हावी करके वो अपने परिवार पर एक डर और अनुशासन का माहोल बना के रखा हुए था ।

लेकिन जब अनुशासन डर बन जाता है तो बच्चे हमेशा बड़ों की सुने या उनसे अपने मन की बात करे ये जरूरी नहीं होता है। वो अक्‍सर वही करते हैं जो उनको नहीं करना चाहिए और वे समझ ही नहीं पाते हैं कि क्या सही और क्या गलत है उनके लिए।

वो दोनों पिता के इस रवैये से काफ़ी डरे हुए रहते थे, कुछ भी करने से पहले वह इतना डर जाते कि हमेशा कोई न कोई गलती कर ही दिया करते थे। इन्ही वातावरण में पल रहे बच्चों से एक छोटी सी गलती हो गयी। गलती भी क्या तो उनके पिता की एक. मनपसंद घरी खेलते समय पानी में गिर कर खराब हो गई, दोनों बहुत डर गए। माँ के बटुए से पैसे चुराए, वो घरी को ठीक कराने के लिए स्कूल बंद कर के दुकान ले गए,  लेकिन घरी तो ठीक नहीं हुई और उपर से उनके पिता के सह मित्र ने भी देख लिया। अब तो बच्चे बहुत ही अधिक डर गए और सोचने लगे कि अब क्या होगा पापा को सब कुछ पता चल जाएगा क्योंकि एक गलती को छुपाने के लिए उन्होंने कई गलतियां कर डाली। ये ही सोचते सोचते दोनों फिरसे घर नहीं जाने का फैसला किया।

वहां पिता साम को जब घर लौटे तो पत्नी को रोते पाया पूछने पर पता चला कि बच्चे स्कूल से घर नहीं लौटे। दोनों ने सारी रात अपने और अपने परोसियों और दोस्तो के साथ हर जगह ढूंढा लेकिन दोनों कहीं भी नहीं मिले। इसी सब में सुबह भी हो गयी। कुछ समय बाद कहीं से शोर मचाने की आवाज सुनाई दी। सभी लोग वहां पहुंचे तो तो देखा दो बच्चों की लाशें वहाँ परी थी पूछने पर पता चला कि कि पानी में ्‍मचछुआरो को मिला। अब पिता को सारी स्थिति समझ में भी आ गया।

लेकिन वो कहावत है न कि “सांप निकल जाएँ तो लाठी पीटके क्या फायदा” समय निकल जाने के बाद पछतावा भी सहानभूति नहीं पहुँचाती है।

मै तो बस हर माता पिता से ये ही कहना चाहूंगी। बच्चों की परवरिस ऐसे करें कि आपको कैसा लगता है। उस अवस्था में जब आपको भी माता पिता के रूप में एक दोस्त मिला होता तो क्या वो समय कुछ और न होता।
 

आप सब अच्छे से ये जानते और सायद मानते भी हैं की उनकी परवरिस कैसे और किस तरह से होनी चाहिए। क्यूंकि उनसे जुड़ी हुई हर बात का खामियाजा अच्छा अथवा बूरा माता पिता को ही मिलता है। और एक बात हमेशा समझने और याद रखने की ये है कि कड़ा अनुशासन डर को जन्म देती है और डर हमेशा ही गलती और झूठ को। इस लिए अपनों के लिए जीएं और अपनों के लिए ही सोचे। और ये कदाचित् न सोचें कि लोग क्या कहेंगे?

Follow @India71_

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here