महापुरुषों की घेराबंदी क्यों ?

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महापुरुषों की घेराबंदी क्यों ?
महापुरुषों की घेराबंदी क्यों ?

आजादी के परवाने महात्मा गांधी जी, पं. नेहरू जी और डा. अम्बेडकर जी आज के भारत की सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था के शिल्पकार / शिल्पी  हैं | बड़े बड़े संस्थान खोले गये जिनमें उनके विचारों पर काम किया जा रहा है | उनके विचारों की नित्य नई नई व्याख्यायें देश की सामाजिक एवं राजनीतिक दशा को दिशा दे रही है | लेकिन सच तो यह है की हमारी सामाजिकता का क्षेत्र सिकुड़ गया है और हम व्यक्तिवाद की ओर बढ़ गये हैं | हमारी मानसिकता इस कदर कुण्ठित हो गई है की हमारे महापुरुष अपने आदर्शों के बजाय अपनी जाति से पहचाने जाने लगे हैं |

प्राय: यह देखा जाता है कि हम भारत के लोग सभी दार्शनिक और चिकित्सक होते हैं | किसी से, चाहे वो किसी भी क्षेत्र का हो, आप उससे किसी भी विषय पर बात करेंगे तो आप को उनकी बातों में दर्शन की झलक मिल ही जायेगी | किसी से भी आप अपनी शारीरिक या मानसिक तकलीफों की चर्चा करके देखिये वो आपको कोई न कोई उपचार या परहेज की सलाह दे ही देगा | यह किसी स्कूल या शैक्षणिक संस्थाओं की देन नहीं है | ये यहाँ की मानवीय परम्पराओं और हमारी संस्कृति का हिस्सा है | हमारे देश में बड़े बड़े दार्शनिक, चिकित्सक एवं समाजसुधारक हो चुके हैं | आज हम उन्हें भूल चुके हैं | उनका नाम मोटे मोटे पुस्तकों के पन्नों के बीच दबा दिये गयें हैं | जब कभी कोई व्यवस्था से सम्बंधित या उससे इतर कोई समस्या उत्पन्न हो जाती है तो उसको अपने पक्ष में सुलझाने या सुलगाने में उन महापुरुषों को अपनी तरह से याद किया जाता हैं |

हमारी सामाजिक व्यवस्था जातिवाद की गन्दी राजनीति में इस कदर उलझ गई है कि हमारे महापुरुष भी इससे बंचित नहीं रहे | हम उन्हें अपनी जाति की चाहरदीवारी के अन्दर समेट लिए हैं | उनके विचार और सिद्धांतों को सिमटाते हुए अप्रासंगिक बनाये जा रहे हैं | जिसने कभी उन्हें पढ़ा हीं नहीं वो सोशल मिडिया पर उनके विचारों को तोड़ मरोर कर लिख रहे है | इतना ही नहीं धर्म की आड़ देकर उनके आदर्शों को पाठ्य पुस्तकों से निकाल दिया गया है उनका नाम लेना भी असहज हो गया है | उनके स्थान पर लालू चालीसा, नीतीश चालीसा और मुलायम चालीसा सरीखे पाठ पढ़ाकर बच्चों को भ्रमित किया जा रहा हैं | आधुनिक और स्मार्ट बनने की लालसा में मानवता बौना पड़ गया है |

नेहरू जी का शांति सन्देश कब का असफल करार कर दिया गया | गाँधी जी का सत्य अहिंसा का मार्ग झूठ फरेब और हिंसा में बदलता जा रहा है | अम्बेदकर साहित्य ने एक नई दिशा देने का प्रयास तो किया लेकिन उसने समाज के एक बड़े वर्ग का ओरियंटेसन ही बदल डाला है | हीनता का भाव उनमें दूसरों के प्रति नफरत भर दिया है | बौखलाहट में वे अपना धर्म परिवर्तन भी कर रहे हैं | आज गाँधी, नेहरू और अम्बेदकर के सिद्धान्त सामाजिक समन्वयता बनाये रखने में असफल हो गये हैं | आपसी  सद्भाव एवं सामाजिक संतुलन बनाये रखने के लिये जरूरी है उन महापुरुषों को चाहरदीवारी से बाहर निकालना होगा | मोटी मोटी किताबों के पन्ने में दबे उनके नाम एवं आदर्शों को बच्चों की पतली पुस्तकों में मोटे मोटे अक्षरों में डालना होगा |

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