मजदूरों का पलायन क्यों?

0
7
मजदूरों का पलायन क्यों?
मजदूरों का पलायन क्यों?

मजदूरों का पलायन सब दिन होता है | काम की खोज में गाँव से शहर, एक शहर से दूसरे शहर आना जाना लगा रहता है | इस समय उनका पलायन कोरोना महामारी के डर से तो है ही, उसकी आड़ में पलायन की समस्या पर हो रही राजनीति से अधिक खतरा महसूस कर रहे थे | कोरोना महामारी से बचना संभव था लेकिन अगर राजनीति में फँस गये तो जीवन भर मरते रहना पड़ेगा | इस विकट समस्या ने उन्हें गाँव का रुख लेने को बाध्य कर दिया | एक तरफ सरकार उन्हें समझाने का प्रयास करती रही कि ‘आप जहाँ हैं वही रहिये, घर में रहिये सुरक्षित रहिये, लोगों से दूरी बना कर रहिये’ तो दूसरी तरफ विपक्ष उन्हें घर जाने की मदद के नाम बसों एवं ट्रेनों के चलने की झूठी जानकारी दे कर घर से निकलने और बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन जाने के लिये प्रेरित किया | मस्जिदों से ऐलान किया गया, सोशल मीडिया से गलत जानकारी फैलाई गई | भुलावे में आकर लोग पैदल बस स्टैंड पहुँचने लगे | भीड़ को बेकाबू करने की मंशा से मजदूरों को जुटाने के लिये दिल्ली में दिल्ली परिवहन की बसे भी चलायी गई | एक दिन, दो दिन तीन दिन दिन-रात लोग भूखे प्यासे बस स्टैंड पर बैठे रहे | मुम्बई, महाराष्ट्र की हालत और बिगड़ गई | देश के लगभग सभी बड़े शहरों में ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो गई | उन्हें एहसास हुआ उनके साथ छल हुआ है | भूख, प्यास, और छल से वे इतनी प्रताड़ना महसूस कि कोरोना महामारी से मरने के बजाय गाँव के रास्ते में मरना पसंद किया |

मजदूर इससे परिचित थे कि कोरोना कोई स्थानीय समस्या नहीं है, इससे संक्रमित मरीजों को चिकित्सक ही अस्पताल में देखभाल करते हैं, परिजनों को वहाँ रहने की कोई इजाजत नहीं है | इसलिए भी अपने घर जाने की ललक उनको बेकाबू कर दिया | इस बात की उन्हें कोई सुध नहीं कि लोकडाउन में घर पहुँचने के कोई साधन नहीं है और पैदल जाने में क्या परेशानियाँ हो सकती है | वे हर खतरे को झेलते हुए अपने गाँव पहुँचना चाहते थे | ये अकारण नहीं था | उनके जीने और मरने के बीच जीवन नहीं, छल के अतिरिक्त भय दिखाई दे रहा था | उन्हें अपने को संक्रमण की स्थिति में अस्पताल पहुँचाने वाला कोई दिख नहीं रहा था | सैकड़ों हजारों के झुंड में रहने वाला अकेला महसूस करता था | कोई भरोसा देने वाला सामने नहीं आ रहा था | उन्हें मृत्यु का भय स्पष्ट दिख रहा था | दूसरी ओर गाँव में अपने परिजनों पर संक्रमण की आशंका भी उन्हें और बेचैन कर रखा था | संक्रमण के समय गाँव पहुँच कर  परिजनों के बीच सामूहिक जीवन जीना अब उनकी अहम जिम्मेदारी थी, एक दूसरे का पूरक बनने की चाहत ने उन्हें बेकरार कर दिया था | अब भूख और प्यास की अभिव्यक्ति उनका एक दिखावा मात्र था | खाना खिलाकर या पैसे की मदद से उनकी भूख या बेचैनी दूर नहीं की जा सकती थी और न ही उन्हें गाँव जाने से रोका जा सकता था | सरकारी एवं गैरसरकारी तथा व्यक्तिगत स्तर से भी कई लोग उनके खाने पीने की व्यवस्था में लगे थे लेकिन उन्हें संतुष्टि नहीं मिल रही थी | सच तो यह था कि उनकी भूख भावनात्मक हो गई थी | इसी सोच के साथ जीवन मरण के बीच राजनीतिक छल और भय को धत्ता देते हुए स्वछन्द भाव से वो अपने गाँव की ओर पैदल चल पड़े |

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here