महबूबा मुफ़्ती क्या सोचती होगी?

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महबूबा मुफ़्ती क्या सोचती होगी?
महबूबा मुफ़्ती क्या सोचती होगी?

जम्मू कश्मीर से धारा 370 और 35अ हटने के कुछ घंटे पहले महबूबा मुफ़्ती कैद में गई | उसे नहीं पता कि उसे क्यों कैद में लिया गया है | लेकिन अपनी सुझबुझ से इतना तो वो समझ गई होगी कि कश्मीर में कुछ उलट फेर होने जा रहा है क्योंकि सरकार के गृह मंत्री श्री अमित साह का इस सम्बन्ध में कई बार बयान आ चुका था |  धारा 370 और 35अ पर भारत सरकार कुछ अलग निर्णय ले सकती है ऐसी शंका वो कर रही थी जैसा कि उसके पहले के बयानों से स्पष्ट होता है | उसका लगातार बयान आ रहा था कि अगर धारा 370 और 35अ के छेड़छाड़ की गई तो कश्मीर जल उठेगा | ऐसे उसके मन में एक बात और थी और भाजपा विरोधी खासकर कांग्रेस और कम्युनिस्टों के लोग भी आश्वस्थ थे कि इस मुद्दे पर सरकार की कोई भी कारवाई फ़िलहाल कठिन है जिसके बहुत से कारण उनके दिमाग में था | लेकिन गृह मंत्री अमित साह द्वारा धारा 370 और 35अ को ख़त्म करने के लिए जब संसद में बील पेश किया गया तो इन के लोगों को लगा कि उनके दिमाग में जैसे बम फूट गया हो | और 5 अगस्त 2019 का वो दिन इतिहास में दर्ज हो गया जब सदन ने न सिर्फ धारा 370 और 35अ की समाप्ति को अनुमोदित किया बल्कि जम्मू कश्मीर से लद्दाख क्षेत्र को अलग कर दिया और जम्मू कश्मीर और लद्दाख दोनों को केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर दिया | इस घटना क्रम की जानकारी किसी न किसी तरीके महबूबा को मिल गई होगी |

जानकारी के बाद महबूबा तो गुस्से से तिलमिला गई होगी और उसके बाद अपनी कैद की विवशता के कारण सदमे में चली गई होगी | होश में आने के बाद सबसे पहले वो उमर अब्दुल्ला से संपर्क करना चाही होगी | उसे क्या मालूम कि उमर अब्दुल्ला भी उसी की तरह कैद में हैं | बारी बारी से वो अपने दल के लोगों से तथा अन्य से संपर्क करने का प्रयास की होगी पर सब असफल रहा होगा | उसको अपने घर और बाल बच्चों की सुधि आई होगी मगर सब बेकार हुआ होगा | अकेले में बैठकर अपने राजनीतिक भविष्य के बारे में वो क्या क्या सोच रही होगी और भविष्य के अपने कश्मीर को लेकर कौन कौन सी योजनायें मन ही मन गढ़ रही होगी इसका आँकलन कठिन है | लेकिन इतनी बात तो सच है कि वो अपनी राजनीतिक जीवन के लम्बे इतिहास का विश्लेषण जरूर कर रही होगी साथ हीं इस बात से अपने आप को भरोसा दे रही होगी कि कश्मीर राष्ट्रीय समस्या हीं नहीं एक अन्तरराष्ट्रीय समस्या भी है | खासकर पाकिस्तान इतनी आसानी से भारत को नहीं छोड़ेगा | कश्मीर की राजनीतिक, सामाजिक एवं क्षेत्रीयता से भारत की अपेक्षा पाकिस्तान का रिश्ता मजबूत है | युद्ध  की स्थिति में भी पाकिस्तान अकेले नहीं है और परमाणु संपन्न शक्तिशाली देश है | आज का पाकिस्तान 1971 के पाकिस्तान जैसा नहीं है | अब उसे विश्व के मुश्लिम देशों के साथ चीन का समर्थन है | चीन को हर हाल में पाकिस्तान के साथ जाना है | चीन को अपने इकनोमिक कोरिडोर पर मंडराते खतरे के मद्दे नजर पाकिस्तान का साथ देना उसकी कूटनीतिक मज़बूरी है | भारत के सम्बन्ध कुछ इस्लामिक देशों से अच्छे हैं परन्तु इस्लाम के नाम पर वो पाकिस्तान के साथ हीं होगा | इन दिनों भारत के सम्बन्ध अमेरिका से कुछ सुधरें हैं मगर पाकिस्तान से उसके सम्बन्ध अच्छे हैं | पाकिस्तान सैन्य साजो सामान के मामले में अमेरिका का बड़ा ग्राहक है | अमेरिका एक व्यापारी है इस हैसियत से वो पाकिस्तान को नकार नहीं सकता | 1971 के युद्ध में भी अमेरिका पाकिस्तान के साथ था परन्तु भारत के पक्ष में रूस के आ जाने से विश्व युद्ध की आशंका हो गई | फलत: दोनों महाशक्तियां तटष्ट हो गई | आज की स्थिति अलग है | पाकिस्तान का रिश्ता रूस से अच्छा हुआ है |  संयुक्तराष्ट्र में चीन और अमेरिका की बदौलत भारत का कमजोर होना अवश्यम्भावी है | ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान भारत पर भारी पड़ेगा |

भारत की बड़ी विपक्षी पार्टियाँ अपने जन समर्थन से  सरकार के इस कदम का पुरजोर विरोध कर रही होगी | जन आन्दोलन हो रहा होगा | कश्मीर की सभी विपक्षी पार्टियाँ एक जुट होकर सड़क पर होगी | साथ हीं भारत के बीस करोड़ मुसलमान अन्दर हीं अन्दर जरूर उबल रहें होगें और किसी भी क्षण ब्लास्ट होगा और सही समय पर कश्मीर की समस्या लेकर पाकिस्तान का वो खुलकर समर्थन करेंगे | भारत की आंतरिक राजनीतिक एवं सामाजिक विवादास्पद समस्या को मोदी विरोधी पाकिस्तान परस्त नेताओं के सहयोग से पाकिस्तान भारत में अशांति पैदा करने की क्षमता रखता है जिसका वो इस बार पुरजोर तरीके से लाभ लेगा | कश्मीर घाटी एवं अन्य जगहों को आतंकवादियों द्वारा निर्दोष लोगों की हत्या की जायेगी जिससे उत्पन्न परिस्थितियाँ पूरे देश के जन – जीवन को दहला देगी | भारत आतंरिक एवं बाह्य दबाव से लाचार हो जायेगा |

इन सब बिन्दुओं पर स्वयं के विश्लेषण से महबूबा मुफ़्ती के आत्मबल को कुछ रसायन मिल रहा होगा | महबूबा को यूँ तो कश्मीर के आतंरिक राजनीतिक आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं के सम्बन्ध में बहुत सारी बातें याद आती होगी लेकिन कैद से मुक्ति मिलने की संभावनाओं पर जब विचार कर रही होगी तो मायूसी के अलावे उसे कुछ अनुभव नहीं होता होगा | उसे याद आ रहा होगा कि उसने जनता के लिए उपयोग में मिले पैसे को कैसे लूट लिया | बच्चों के हाथ में कलम कागज की जगह पत्थर के टुकड़े पकड़ा दिये | स्कूल कॉलेज खोलने के बजाय देश विरोधी कैम्प खोलकर गोले बारूद बनाना और हथियार चलाना सिखाया | पैसे के बन्दर बाँट के मामले में वो वर्षों जेल की हवा खा सकती है | उसके मन की यह सोच उसे बेचैन कर देती होगी | भारत पाकिस्तान के बीच चौधराईन बनकर दोनों को पूजाने वाली महबूबा कैद में अपने अच्छे बुरे कार्यों की समीक्षा भी कर रही होगी | उसने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि धारा 370 के छेड़ छाड़ पर कश्मीर के जलने जलाने वाली महबूबा खुद अन्दर हीं अन्दर विवशता में जल कर कभी भस्म हो जायेगी | भारत सरकार को बराबर आंतरिक ठेंगा दिखाते हुए अपना उल्लू सीधा करने की मंशा उसे महँगी दिखाई दे रही होगी | 1989 की रुबिया अपहरण की घटना भी उसे याद आ रही होगी | उसके पिता मुफ़्ती मोहम्मद सईद घटना से कुछ हीं दिन पहले 02. 12. 1989 को बनी भाजपा समर्थित वी. पी. सिंह के नेतृत्व में बनी केंद्र की सरकार के गृहमंत्री के रूप में शपथ ली थी | इसके सातवें दिन 08. 12. 1989 को महबूबा की दूसरी 23 वर्षीय छोटी बहन डा. रूबिया को मुजाहिदीन आतंकियों ने अपहरण कर लिया | रुबिया की रिहाई पांच आतंकियों की जेल से रिहाई के बदले में हुई | इस रिहाई के लिये पद और प्रतिष्ठा का अनुचित उपयोग किया गया | गृहमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद के कार्यकाल {दिसम्बर 1989 – नवम्बर 1990} में हीं कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से भगाया गया था | इससे महबूबा और उसके परिवार की देश विरोधी नीति का अंदाजा लगाया जा सकता है | एक बार फिर केंद्र सरकार से अनुचित लाभ लेने के उद्देश्य से कश्मीर में भाजपा के साथ मिलकर महबूबा ने सरकार बनायी लेकिन भाजपा जल्द ही उसकी मंशा भाँफ गई और सरकार से पीछा छुड़ा ली | आतंकियों के हमसफ़र महबूबा इन घटनाओं को याद कर कभी गौरवान्वित होती थी आज उसी के कारण भींगी बिल्ली बनी बैठी है | वेशक विवश है |

हाल में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से महबूबा की बेटी अपनी माँ से मिली होगी और कश्मीर पर देश दुनियाँ की खबर से उसको अवगत कराया होगा | माँ बेटी के बीच बातचीत का कोई अंश सामने तो नहीं आयाहै लेकिन कश्मीर पर भारत में किसी भी अप्रिय घटना या जन आन्दोलन नहीं होने और मुस्लिम देशों के साथ साथ संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की फजीहत सुनकर महबूबा को अपने पूर्व के विश्लेषणों पर दुबारा विचार करने के लिए जरूर मजबुर कर दिया होगा |     

धारा 370 के हटने के उपरांत कश्मीर के जलने जलाने के अपने बयान के क्रियान्वयन पर विवेचना करते हुए उसे शर्मिंदगी महसूस होती होगी या कैद में प्रधान मंत्री मोदी का मंत्र ”अच्छे दिन आयेंगे“ का जाप करते बाहर निकलने के बाद कोई अलग रणनीति पर काम करेगी इस सोच में लगी होगी | उसकी सोच में जो भी हो पर इतनी बात तो सच है कि जब वो बाहर निकलेगी तो उसे एक नया कश्मीर देखने को मिलेगा | कश्मीर विधानसभा से लेकर सरकारी एवं गैरसरकारी सभी संस्थानों पर तिरंगा लहराते देख महबूबा की क्या प्रतिक्रिया होगी थोड़ा इन्तजार कीजिये |

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