मैं एक स्त्री!!

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मैं एक स्त्री!!
मैं एक स्त्री!!

कितनी थकी थकी सी है जिन्दगी, कभी लुढ़कती कभी सम्भलती, तिनका-तिनका जोड़ कर, हस्ती बनी स्त्री!!

कई बार देखा होगा कोई ऐसी वस्तु जिसकी ऊपरी परत सजी सवरी होगी। देखने में आकर्षित लगती होगी। दूसरों को उससे अधिक सुंदर कुछ भी नहीं लगता होगा । गृहणी एक ऐसी ही वस्तु है दूसरों के लिए। इत्तेफ़ाकन ऐसे ही होती है वह स्त्रियाँ जो सिर्फ घर संभालती है, सिर्फ बच्चों का पालन पोषण करती है, सिर्फ बड़े बुजुर्गों का आदर करती है, सिर्फ़ अपनो के सुख दुःख की चिंता करतीं हैं, जो सुबह से रात तक एक ही जैसा जोश और उत्साह के साथ पूरे घर अथवा  घर के सारे सदस्यों की देखभाल करती है। इतने पर भी न जाने क्यूं लोग उसके जीवन को “सिर्फ” अथवा “क्या करती ही है” तक ही सीमित कर देते हैं।

ऐसे ही जीवन जी रही वह स्त्रियाँ जिसकी पूरी जिंदगी सपने पर निर्धारित होती है जीवन के पहले पड़ाव से अन्तिम तक। शादी से पहले भी कई सपने सजाया होगा स्वयं पर इतना भरोसा होगा कि कैसा भी परिवार हो उनके जीवन में अपने व्यवहार से उन सबके दिल में जगह बन ही जाएगी। उन सब के घर और मन में एक मजबूत स्तंभ के समान जुड़ जाने का दृढ़ विश्वास के साथ ससुराल आई होगी। 

लेकिन शादी के बाद जीवन की असली सच्चाई के साथ सामना होता है | जो सपनों की दुनियां के एकदम विपरीत होती है । हर दिन एक नई चुनौती एक अनजाना अथवा विकट परिस्थिति, काम कैसा भी हो उसका अंजाम पूर्ण रूप से सोच के विपरीत ही होती है।

सीधी बात कहा तो लोगों का कहना होता बातों में गंभीरता नहीं है। कुछ न कहो तो व्यवहार में कटुता है। अपने मन से कोई काम करो तो यह काम गलत है पूछ के क्युं नहीं किया। कुछ करने से पहले पूछा तो सुनने को मिलता है लड़की में किसी भी प्रकार की समझ बूझ ही नहीं है। किसी भी बात में किसी भी तरह की कोई सकारात्मकता होती ही नहीं है । सपने इच्छाएं यह सब तो  किसी के झूठे अहंकार के नीचे दब कर दम तोड़ चुका होता है । अब तो ख्वाहिशों की जगह फर्ज, इच्छाओं की जगह दूसरों की आरजू अथवा आजादी के स्थान पर जिम्मेदारियों ने ले लिया। 

समय काफी हद तक हाथों से फिसल चुका होगा। चाह कर भी अपने सपनों को पूरा नहीं कर पाने की चुभन मानो दिल के किसी कोने में हमेशा ही नासूर बन कर टभकता रहता है । इतना कुछ करने अथवा आधी से अधिक जिन्दगी इसी हालात में बीताने के बाद भी जब अपना आँचल टटोला होगा तो उसे खाली ही पाया होगा ।

अपना समझा जिस घर को वह किराये का निकला, आँचल के छाया में जो पला वह तो किरायेदार निकला, तब जाके एहसास हुआ मुझको, लिया तो हमने कुछ भी नहीं, फिर भी पूरी जिन्दगी  करजदार निकला ।

किसी ने ठीक ही कहा है कि गृहणियां कुछ नहीं करती सारी जिन्दगी सिर्फ स्वयं को व्यस्त दिखाती। तभी तो जब जो भी चाहे वह यह कह कर ठोकर मार देता है कि तुम्हारा क्या है यहाँ तुमने क्या कमाया है। तुम्हारे खून पसीने से क्या यह मकान बना है। यह बात सौ फीसदी सच है गृहणियां बाहर नहीं कमाती लेकिन मकान को घर वही बनाती हैं, बच्चों में संस्कार वही भरती हैं, बिखरे सभी रिश्तों को एकजुट करके वही सम्भलती हैं, आर्थिक रूप से भले भागेदारी न दे सके, लेकिन कन्धे से कन्धा मिलाकर हर सुख दुःख में बराबर का सहयोग एक गृहनी ही देती है। 

फिर भी औरत ही क्युं सारे दुःखों की जिम्मेदार होती है? औरतों के सम्मान को ही क्युं तार तार किया जाता है? अग्नि परीक्षा औरतों से ही क्यों ली जाती है? तलाक का दर्द औरतें ही क्यों सहती हैं, औरतें ही क्यों जिंदा जलाई जाती है? अकेलापन औरतों के हिस्से में ही क्यों आता है? इन बातों का जवाब आज हर वह इन्सान बताए अगर घर को गृहणी की आवश्यकता नहीं है तो अकेले ही हर मर्द घर बाहर सब कुछ संभाल क्युं नहीं लेते हैं। क्युं न अपना आशियाना बिना औरत के ही पूरा कर लेते हैं । क्युं न हर काम की शुरुआत स्वयं से ही अथवा  खत्म स्वयं पर ही कर लेते हैं। एक बार स्वयं को अपनी अर्धांगिनी के स्थान पर रख कर देख ले। शादी से लेकर तलाक तक की सारी समस्याओं का समाधान खुदही मिल जाएगा।

“” जिन्दगी कितनी भी बेबस हो, अंधेरा कितना ही घनघोर हो, 
जिन्दगी आग के लपटों में घिरे, चाहे समन्दर की गहराईयों में डूबे |
बस तेरा साथ सच्चा हो, मरहम के जगह बातों की नरमी हो, 
दिल से प्यार आंखों से सम्मान मिले, तब कुटिया में भी महलों सा आराम मिले || “”


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