मिथिलांचल की वट सावित्री

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मिथिलांचल की वट सावित्री
मिथिलांचल की वट सावित्री

यूं तो हम साल भर कितने ही त्यौहार मनाते हैं। होली, दीपावली, नव रात्रि, छट, तीज, जितिया, और न जाने क्या-क्या सबके अपने अपने मायने होते हैं। कुछ अपने घर की सुख समृद्धि के लिए, तो कुछ बच्चों के जीवन के लिए, कुछ अपनों की उन्नति के लिए, कुछ इच्छाओं की पूर्ति के लिए, तो कुछ शांति के लिए। हर त्यौहार हर व्रत के पीछे कोई न कोई जिन्दगी की सच्चाई जुड़ी होती है। 

ऐसे ही सारे व्रतों में बहुचर्चित व्रत में एक व्रत वट सावित्री की भी होती है।आजकल यह व्रत सभी जाति के लोग मानते हैं। लगभग सभी जगहों पर मनाते हैं। लेकिन आमतौर पर यह व्रत मिथिलांचल में बहुत ही सुंदर तरीके से मनाया जाता है। वैसे तो यह व्रत शादीशुदा महिलाएं हर साल एक जैसे तरीके से मनाती है। लेकिन शादी के बाद पहले साल में यह कुछ खास और भव्य तरीके से मनाया जाता है। 

शादी के तुरंत बाद के पहले साल में नवविवाहिता अपने ससुराल में जब यह व्रत करती है तो इस व्रत को पूरा करने के लिए उसके पीहर से व्रत की सारी सामाग्री भार के रूप में उसके ससुराल भेजी जाती हैं।जैसे कि खजूर, गुजिया लड्डू, खाजा, गाज़ा, पांच तरह के मिठाइयाँ, आम, लीची, दही ,पंखा, सारी कपड़ा, गुड्डा गुड्डी और भी अपनी हैसियत अथवा इच्छा से बहुत कुछ। तब नवविवाहित पीहर से आए कपड़ों को पहन कर ढेर सारा शृंगार करके सारा दिन उपवास रख कर वट वृक्ष के पास बैठ कर पूरे श्रद्धा भाव से वट वृक्ष की पूजा करती है फुल फल मिठाई जल का भोग लगाती है, धागा बाँध के अपना बनती है नये पंखे से हवा करती है। इसी तरह से गुड्डा गुड्डी की भी पूजा कराती है। उसके बाद माँ सावित्री की व्रत कथा को पढ़ती अथवा सुनती है।इस तरह से पूरे श्रद्धा भाव से अपने जीवन साथी का साथ और उसकी लंबी आयु और उन्नति मांगती है। उसके बाद सारा दिन व्रत करके एक बार फलाहार करके अपने व्रत को पूरा करती है।

माँ सावित्री उस पर और उसके पूरे परिवार पर अपनी दया दृष्टि बनाए रखने की प्रार्थना करते हुए वट सावित्री की व्रत कथा को पूर्ण करती है। इस तरह से सभी शादीशुदा जोड़े इस त्यौहार को बड़े ही सुन्दर और उत्साहपूर्ण तरीके से मनाते हैं। 

“माँ सावित्री करो कृपा, करो हृदय में वास 
रिद्धि-सिद्धि से पूर्ण करो, करो दुश्मनों का नाश 
जैसे तुमने जीता सत्यवान को, पाया अमर सुहाग, 
बसों हर स्त्री के मन में तुम, हो जाए उसका भी अमर सुहाग। 
बन जाये हर स्त्री सावित्री, मिल जाये उसको भी सत्यवान।”


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