पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों का एक्जिट पोल

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पाँच राज्यों के विधान सभा चुनावों का एक्जिट पोल
पाँच राज्यों के विधान सभा चुनावों का एक्जिट पोल

2018 के अन्तिम महीने दिसम्बर 7 को 5 राज्यों छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना और मिजोरम के विधान सभाओं का चुनाव समाप्त हो गया | चुनाव परिणाम 11 दिसम्बर को आने वाला है | जनता का मत ई. भी. एम. में बन्द है | 7 दिसम्बर के शाम 5:00 बजे से एक्जिट पोल पर विभिन्न चैनलों पर बहस छिड़ी हुई है जो 11 तारीख के सुबह 6 बजे से पहले तक चलता रहेगा | ये बहस खासकर दो पार्टियों भाजपा एवं कांग्रेस के जीत-हार के विश्लेषण पर केन्द्रित है | विभिन्न सर्वे एजेन्सियों द्वारा भाजपा एवं कांग्रेस के विधान सभाओं में एक्जिट पोल में दिखायें गये सदस्यों के संख्या बल पर बहस आधारित है | मीडिया चैनलों द्वारा विभिन्न पार्टियों के प्रवक्ताओं को अपने-अपने पक्ष एवं विपक्ष में बहस का हिस्सा बनवाकर अपने-अपने पार्टियों के जीत हार के कारणों को दर्शकों के बीच प्रसारित किया जाता है | राज्यवार विश्लेषण से दर्शकों को यह समझाया जाता है कि क्यों कोई पार्टी जीत रही है तो कोई हार रही है |

जब आप सारे विश्लेषणों की गहराई में जायेंगे तो महसूस करेंगे कि इन दोनों पार्टियों के अन्दर न तो जीत का जश्न है और न ही हार का गम | दोनों ही पार्टियों को अपनी-अपनी जीत या हार का जबरदस्त तर्क है | भाजपा की हार के सम्बन्ध में भाजपा का कहना होगा कि वह छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश में तीन बार सरकार बना चुकी है और चौथी बार के लिये चुनाव हुआ है | इसलिये वह सत्ता विरोधी (एंटी इनकम्बेंसी) का शिकार हुई है | यह साधारण सी बात है | जीत के लिये कांग्रेस का कहना होगा कि भाजपा सरकार फेल हो चुकी थी और कांग्रेस ने काफी मेहनत किया है | अगर कांग्रेस हारती है तो उसका सीधा जवाब होगा कि उसका संगठन कमजोर था जो विगत चार सालों से वो झेलती आई है | भाजपा का कहना होगा कि जनता उससे खुश है | जहाँ तक राजस्थान की बात है वहाँ दोनों पार्टियाँ हार-जीत में संतुष्ट है क्योंकि वहाँ हार-जीत की परम्परा का निर्वाह जनता ने पूरा किया है | वहाँ की परम्परा रही है एक बार भाजपा तो दूसरी बार कांग्रेस |

जीत की खुशी और हार का गम उन नागरिकों को हो सकता है जो वास्तविक रूप से किसी पार्टियों की नीति एवं कार्यप्रणाली से संतुष्ट थे | उन नागरिकों को न जीत का हर्ष होगा न ही हार का गम जो हर चुनाव में इधर से उधर होते रहते हैं | राज्यों का चुनाव तो व्यक्तिगत सम्बन्धों एवं स्थानीय मुद्दों पर आधारित रहता है | जीत की खुशी या हार का विषाद केन्द्रीय अर्थात संसदीय चुनाव के परिणाम से होता है क्योंकि वहाँ पार्टी की नीति एवं कार्यप्रणाली की विश्वश्नियता को समझ एवं परख कर नागरिक अपना मत डालते हैं |

एक्जिट पोल के नतीजे मात्र कुछ मतदाताओं से प्राप्त जानकारी के आधार पर की जाती है | मतदाता उन्हें सही जानकारी दे रहे हैं या नहीं यह मायने रखता है | ऐसा भी देखा गया है कि एक्जिट पोल शत प्रतिशत गलत हो गये हैं | कौन प्रत्याशी जीत रहा है कौन हार रहा है इसका आकलन उस क्षेत्र के मतदाताओं के पास होता है | चुनाव से पहले ओपिनियन पोल आया था | वो सीधे जनता से पूछकर किया जाता है | वर्तमान चुनाव से पहले जो ओपिनियन पोल आया था उसमें भाजपा तीनो राज्यों में कांग्रेस से काफी अन्तर से हार रही थी | भाजपा का संख्या बल काफी नीचे था | लेकिन एक्जिट पोल में भाजपा की संख्या बल काफी ज्यादा है | यहीं देखिये ओपिनियन पोल और एक्जिट पोल में बहुत अन्तर है | आप इससे वास्तविकता का अन्दाजा लगा सकते हैं | ओपिनियन पोल या एक्जिट पोल पर बहस करवाना मीडिया का अपना एक कार्यक्रम है जिससे उनका टी. आर. पी. बढ़ता है और दर्शकों का घंटे भर का समय बर्बाद होता है | हालाँकि बहस से कुछ फायदा भी है- इससे जीत-हार की खुशी या गम को जनता आत्मसात करने की पहले से ही चेष्टा करती है |

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