पकौड़ा पॉलिटिक्स

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पकौड़ा पॉलिटिक्स
पकौड़ा पॉलिटिक्स

हाल ही में पच्छिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने युवकों को पकौड़ा छानकर / बनाकर बेचने का सुझाव दिया है| उन्होंने एक उदाहरण भी पेश किया की उनके घर के बगल में एक पकौड़ा बेचने वाले ने कुछ ही समय में पकौड़ा बेचकर तीन मंजिला मकान बना लिया है| उनका ये सुझाव सियासी हो या वास्तविकता ये मैं नहीं कह सकता परन्तु इतना तो जरुर है कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने स्वरोजगार योजना के अंतर्गत पकौड़ा बेचने की बात थी तो विपक्षियों ने रातों-रात हंगामा मचा दिया था, मजाक बना दिया था| बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध कराने के वजाय पकौड़ा बेचने का सुझाव देकर मोदी जी ने  बेरोजगारों की हँसी उड़ाई है, विपक्ष का यही कहना था| मगर आज मोदी जी का घोर विरोधी ममता बनर्जी ने भी पकौड़े बेचने की बात कह डाली है, उसपर कोई हंगामा नहीं हो रहा है| इसका अर्थ है की मोदी जी की बात विपक्षियों को धीरे-धीरे रास आ रहा है| ममता जी की बात सियासी ही क्यों न हो मगर उन्होंने सच ही कहा है| भारत के गाँव से लेकर शहर के पाँच सितारा होटलों तक शाम के चार बजे से रात के आठ बजे तक खाने पीने के सामानों में सबसे ज्यादे पकौड़े की बिक्री होती है और लोग उस समय में पकौड़े ही खाना पसन्द करते हैं| एक पकौड़े की कीमत गाँव में पाँच रुपये, शहर के फुटपाथ पर दस रुपये और पाँच सितारा होटलों में तीन सौ से पाँच सौ रुपये तक होता है| परन्तु सच मानिये स्वाद तो गाँव के पकौड़े में ही होता है| पकौड़े कहीं का भी हो नाम सुनते ही मुँह में पानी आ जाता है| पकौड़े के स्वाद का गुणगान करना है तो टेस्ट करके देख लीजिये|

वर्तमान सन्दर्भ में पकौड़े बेचना रोजगार से जुड़ा है| इसका मजाक नहीं उड़ाना चाहिये| छोटी छोटी चीजें भी बहुत काम की होती है| कम लागत में अच्छा खासा मुनाफा देने वाला यह बेजोड़ धंधा है| बच्चे से लेकर बूढ़े तक इसे पसंद करते हैं| इस धंधे के लिये समय भी निश्चित हैं- शाम का, दो से चार घंटे काम किजिये अच्छा मुनाफा लेकर घर लौटिये| शेष समय में आप दूसरा काम भी कर सकते हैं| वैसे समय बाजार पर भी निर्भर करता है| यह मुख्य या क्षतिपूरक रोजगार दोनों ही रूप में अपनाया जाता है| इसमें प्रारम्भ के दिनों में अधिक मानव शक्ति की भी आवश्यकता नहीं होती है| जगह का भी कोई उतना महत्त्व नहीं होता| बाजार में कहीं भी ठेला खड़ा कर लीजिये|

संक्षिप्त में हम कह सकते हैं कि कम लागत, न्युनतम मानव शक्ति, जगह कहीं भी बाजार में, कम व्यावसायिक समय में पकौड़े बेचने का धंधा स्वरोजगार के अंतर्गत ज्यादा मुनाफा देती है| इस धंधे को मजाक में मत लीजिये| इस धंधे में पूर्णकालिक रोजगार वाले साल में लाखों रुपये का आयकर अदा करते हैं|

मोदी जी ने पकौड़े बेचने वाले को स्वरोजगार से जुड़े होने की बात कही थी, उनके कथन में कोई मजाक नहीं था| ममता जी भी अब वास्तविकता को समझी है अतः लगता है की ममता जी का कथन सियासी नहीं है| रोजगार तो अपना होता है| इसकी तुलना नहीं की जा सकती है| पकौड़ा बेचना एक सम्मानित रोजगार है| इसे सियासी रंग मत दीजिये और पकौड़े का लुत्फ उठाइये|

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