समय के साथ बच्चों की बदलती मानसिकता

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समय के साथ बच्चों की बदलती मानसिकता
समय के साथ बच्चों की बदलती मानसिकता

आज लगभग सभी परिवार में एक या एक से अधिक बच्चे अपने भविष्य बनाने अथवा सजाने की और अग्रसर है। ऐसे में उनके सोच पर माहोल की क्या भूमिका होनी चाहिए, इसकी थोड़ी सी समीक्षा करने अथवा जानने की कोशिश करते हैं।

आज आपने ऐसे कितने ही घरों में देखें होंगे कि आजकल के बच्चों को कम समय में सबकुछ पाने अथवा करने की भरपुर इच्छा होती है। ऐसे में सही मार्गदर्शन न मिलने पर आज के युवा या तो स्वयं अपना मार्ग चुन लेते हैं। या नहीं तो ऐसे समय में उनके आसपास जो भी रास्ता छोटा अथवा कम मेहनत वाला होता है वह उसे ही चुनते हैं।आजकल बच्चे कच्ची उम्र में ही बड़े हो जाते हैं। सारे फैसले खुद ही लेना चाहते हैं। किसी की दखलअंदाजी बर्दास्त नहीं कर पाते हैं। ऐसे में उनके साथ हमे छोटी उम्र से ही उन्हें समझने अथवा समझाने की कोशिश करनी चाहिए। 

कुछ ऐसे ही तथ्य है जिस पर शायद हमें भी गौर करने कि आवश्यकता है। 

सबसे पहले तो हमें अपने बच्चों की मानसिकता को समझने की कोशिश करनी है। वो क्या सोचते हैं या हम जो भी बोलते हैं, बच्चे उसको किस तरह से लेते हैं या उसका क्या अर्थ निकालते हैं, यह जानना हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। 

अक्‍सर आपने देखा होगा कि हमारे डांटने चिल्लाने पर बच्चे बहुत जल्दी खुद को हमारे बातों के हिसाब से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, और बात वहीं ख़त्म कर देते हैं । लेकिन यह हमारी पहली गलती होती है अपने बच्चों की परवरिश के तरफ। क्योंकि यही वह समय होता है जब हम अपने बच्चों को सही दिशा देने की पहली कोशिश कर सकते हैं। 

बच्चों के परवरिश के बहुत से तरीके हैं जैसे कि पहले प्यार फिर शासन फिर दोस्ती। लेकिन इन तरीकों को हमने पूरी तरह से भूला दिये है। हम अपने दैनिक जीवन में इस तरह से व्यस्त हो जाते हैं कि हम अपने बच्चों को कब किस तरह की परवरिस दें इस बात को पूर्ण रूप से नजरअंदाज कर देते हैं। हम अक्सर अपनी जिम्मेदारीयों  को स्कूल अथवा दूसरे के भरोसे छोड़ देते हैं। इससे उनकी परवरिश से अपना योगदान ही खत्म कर देते हैं। जिसका खामियाजा हम पुरी जिंदगी भोगते हैं। 

यह भी आपने देखा होगा कि माता पिता अपने बच्चों की हर फरमाइस को पूरा करना अपना पहला कर्तव्य समझते हैं इसका मुख्य कारण है हमारी व्यस्तता। हम अक्सर अपना समय उनको न देने के कारण उनकी मांगों को पूरा कर देते हैं। जिस कारण उनको बिना किसी मेहनत के हर चीज पाने की आदत हो जाती है। 

कभी कभी हम अपने बच्चों पर जरुरत से अधिक शक्ति कर देते हैं। उनकी छोटी छोटी जरूरतों को भी पूरा नहीं करते हैं। जिस कारण बच्चे स्वयं ही अपनी जरूरतों को पूरा करने के रास्ते खोजने लगते हैं। ऐसे समय में बच्चे सही गलत का हिसाब नहीं किया करते हैं। 

अक्सर हमारी शक्ति से बच्चों के ऊपर उसका विपरीत प्रभाव परता है। जब बच्चे समय से पहले जवाब दे दिया करे अथवा हर बात पर हमें हमारे मानसिकता के अनुसार उत्तर दे। इसका मतलब बच्चों ने झूठ बोलने का प्रयास प्रारंभ कर दिया है। यह गलत रास्ता पकरने की पहली सीढ़ी है समझ लीजिए। 

जब बच्चे अपना अधिक समय दूसरों के साथ बिताये, हर बात पर झुंझलाहट भरी अवाज दे, अकेले रहना पसंद करे तो समझ लीजिए कि यह बच्चों के प्रति सतर्क होने का समय है। 

इसीलिए अक्सर आपने देखा अथवा सुना होगा बच्चों की मानसिकता को समझने का सही समय 10 वर्ष की आयु तक की होती है। इस समय बच्चे कच्ची मिट्टी के समान होते हैं। उनके सौख उनकी इच्छाएं सब आगे बढ़ने के लिए सहयोग ढूंढते हैं। ऐसे समय में माता पिता ही एक ऐसे कुम्हार होते हैं जो अपनी मिट्टी को सही आकार दे सकते हैं। अथवा उनकी प्रतिभा को निखारने में अपना सही योगदान दे सकते हैं। 

इच्छाओं पर संयम रखना, जरूरतों को सही समय पर पूरा करना, रीस्तों को समझना, दूसरों के सुख दुःख में स्वयं को संलग्न करना, समय के अनुसार खुद को हर हालात के लिए तैयार रखना, सबसे जरूरी हमेशा सच्चाई अथवा ईमानदारी से सबके लिए खरे होना। अगर माता पिता ऐसी परिस्थितियों को सही समय पर सही तरीके से समझ कर उसको संभाले तो यकीनन हम अपने अथवा अपने देश के भविष्य को सही तरीके से सम्भालने वाले हाथ दे पाएंगे। 

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