सत्ता के लिये जातिवाद

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सत्ता के लिये जातिवाद
सत्ता के लिये जातिवाद

भारत में वर्ण व्यवस्था सदियों से चली आ रही है | ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र चार जातियों का वर्णन भारतीय संस्कृति के इतिहास में बहुत पुराना है | पूर्व में जाति व्यवस्था काम के आधार पर होती थी | आज जन्म के आधार पर जाति सुनिश्चित किया जाता है | समय के बदलते स्वरूप ने इन चार जातियों से उपजातियाँ निकालती चली गई | उनके निवास स्थान बदलते चले गये | स्थान विशेष में बस जाने के कारण उनके आचार-विचार एवं रहन सहन में भिन्नता आती गई | जातियों का यह समूह हमारे भारतीय संस्कृति की खुशबू है | इसे मिटाया नहीं जा सकता है | इसकी जड़े काफी मजबूत हैं |

वर्तमान भारत को बड़ी संख्या में भिन्न-भिन्न जातियों वाला जनसमूह सौगात में मिला है | इस सौगात को हमें बचा कर रखना है | शुक्र है कि भिन्नता होने के बावजूद भी हम सभी एक झंडे के नीचे चैन से रह रहे हैं | परन्तु यह चैनियत अब ज्यादे दिन रहने वाला नहीं लगता है | सभी जातियों का समूह इकट्ठे बेचैन होता दिख रहा है | अब समय सोचने का आ गया है कि भारतीय लोकतंत्र इसको कैसे संभालेगी |

सत्तर सालों की राजनीतिक व्यवस्था ने आपसी सद्भाव को बिगाड़ कर रख दिया है | एक व्यक्ति दूसरे का नहीं बल्कि एक पूरी जाति समूह दूसरे का विरोधी हो गया है | वोट की राजनीति के लिये जातिवाद एवं जाति उन्माद पैदा कर राजनीतिक दलों ने पूरे देश में अराजकता का माहौल पैदा कर दिया है | चुनाव के समय कोई नौकरी में आरक्षण देने के नाम से तो कोई कर्ज माफी का प्रलोभन देकर,कोई बिजली पानी शुल्क माफ करने तो कोई साइकिल, लैपटॉप देने का वचन देकर जनता से वोट लेने के लिए वादा करता है | लोभ किसे नहीं डंसता है | नेताओं द्वारा प्रलोभनों को बार-बार दुहराने से भोली भाली जनता लोभ में फँस जाती है | यही तो लोकतंत्र है अभी | आरक्षण का मामला तो और भी गम्भीर है | आरक्षण कोटि में आने वाले नौजवान अपने को स्वयं सक्षम नहीं बनाकर आरक्षण के भरोसे नौकरी प्राप्त कर लेते हैं | मगर धीरे-धीरे इसका बुरा असर उस कोटि के नौजवानों पर पड़ता है | आरक्षण की आड़ में उनका मनोबल ऊँचा उठ नहीं पाता है | उनका आत्मबल कमजोर पड़ने लगता है | एक तरह का भटकाव आ जाता है जिसे राजनीतिक दलों द्वारा मनमानी से उपयोग किया जाता है | नौकरी में आरक्षण के मुद्दे पर एक वर्ग दूसरे के सामने खड़ा है | उनकी मानसिकता में सिर्फ नौकरी “वो भी सरकारी” प्राप्त करना है | दूसरा भी धंधा है, उद्योग है, उनके दिमाग से हट गया है | कोई भी राजनीतिक दल प्रत्यक्ष रुप से कुछ नहीं बोल रहा है मगर परोक्ष रुप से वे दोनों के पीछे हैं | 

भिन्न भिन्न जातियों की संस्कृति एवं उनके आचार-विचार भिन्न होते हैं | बावजूद इसके, सबों के बीच मानवीय लड़ी होती है | यही तो अनेकता में एकता है जिसके लिये हर जगह भारत की प्रशंसा होती है | इसको तोड़ने के लिये विदेशी भी इच्छा रखते हैं लेकिन सफल नहीं हो पाये आजतक | जिस एकता को विदेशियों ने भी नहीं तोड़ पाया उसे अब अपने देश के नेतागण भंग करने में लगे हैं | सत्ता ग्रहण करने के लिए क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय राजनीतिक दल सब अपनी जोड़ आजमाइस कर रहे हैं | वे कोई भी कदम उठाने से बाज नहीं आयेंगे – लोगों को भटका कर, समाज को तोड़कर, धर्म की आड़ में अराजकता फैला कर देश को अस्थिर करने की साजिश भी कर सकते हैं |

उनकी इस मंशा को जनता को समझना होगा | इसका प्रतिकार करना होगा अन्यथा जातियों का बँटवारा करते-करते देश के बँटवारे का खतरा उत्पन्न हो जायेगा | जरुरत है क्षणिक लाभ को त्याग कर दूरगामी लाभ के लिये सावधानी पूर्वक चुनाव में अपना मत डालना |


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