सवर्णों की दशा एवं दिशा

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सवर्णों की दशा एवं दिशा
सवर्णों की दशा एवं दिशा

आज समय आ गया है सवर्णों पर विचार करने का | विचार करने से पहले सवर्ण को परिभाषित करना आवश्यक है | वर्ण का अर्थ होता है “जाति” | इसका अर्थ “रंग” भी होता है परन्तु यहाँ यह अर्थ अप्रासंगिक है | वर्ण के पीछे “स” लगने से सवर्ण बनता है जिसका मतलब सुन्दर रंग, सुन्दर जाति | इसका सीधा तात्पर्य है वो जाति जिनका रंग सुन्दर हो, जिनके विचार सुन्दर हों, जिनका रहन-सहन सुन्दर हो | ये नामकरण आजाद भारत में हुआ है | आजाद भारत में जातियों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया: पहला सवर्ण, दूसरा पिछड़ी जाति और तीसरा अनुसूचित जाति एवं जनजाति | तीनों श्रेणियों में तीसरे श्रेणी के लोगों के लिये उनके कल्याणार्थ अलग नीतिगत कानून का प्रावधान किया गया |

समय बदलता गया | इसके साथ देश की राजनीतिक परिवेश भी बदलता चला गया | सत्ता का लोभ राजनीतिक लोगों में पनपने लगा | फलतः सत्ता के लिये राष्ट्रीय स्तर से लेकर क्षेत्रीय स्तर पर नये-नये राजनीतिक दलों का गठन होने लगा | वोट की राजनीति की अवधारणा जोड़ पकड़ने लगी और देश के विकास या समाज के विकास की नीति कमजोर पड़ने लगी | जातीय स्तर पर नेता उभरने लगे | जिनके पास संख्या बल अधिक था उनका राजनीति में दबदबा बढ़ने लगा और उनकी बातों को सरकारी मान्यता भी मिलने लगी | इसी दवाब से पिछड़ी जाति के लोगों के लिये नौकरी में आरक्षण का प्रावधान सरकार ने कर दिया | अब सवर्णों की बारी थी | सवर्णों के लिये सरकार कुछ सोच पा रही थी या नहीं इससे पहले तीसरी श्रेणी अर्थात अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोग जो सरकार द्वारा स्थापित कल्याणकारी योजनाओं से पूर्ण खुश नहीं थे, हड़ताल धरना आदि कार्यक्रम शुरु कर दी | सरकार उन लोगों को खुश करने के लिये नौकरी में आरक्षण के अतिरिक्त नौकरी में कालबद्ध पदोन्नति का प्रावधान कर दिया | और तो और इनकी सुरक्षा एवं भविष्य में अन्य लाभकारी योजना प्रदान करने निमित्त एक आयोग “अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग” के नाम से गठित कर दिया | इसके माध्यम से वो बहुत सारे क्षेत्रों में लाभान्वित हो रहे हैं | कुछ का वर्णन नीचे है :-
1)    निःशुल्क शिक्षा के साथ माहवारी स्टाइपेन्ड एवं छात्रावास |
2)    निःशुल्क बिजली कनेक्शन |
3)    नौकरी के लिये आयुसीमा में छूट |
4)    आवास योजना |

सवर्णों ने खिन्न होकर न्यायालय की शरण में गये | उच्चतम न्यायालय ने तीसरी श्रेणी के लोगों को मिलने वाली बहुत सारी लाभकारी योजनाओं को असंवैधानिक करार कर दिया | सवर्णों का धैर्य तब टूट गया जब सरकार ने तीसरी श्रेणी के लोगों के मामले में आये उच्चतम न्यायालय के आदेश को पलट दिया | कालबद्ध पदोन्नति फिर से लागू हो गया | इसके अलावे इन जाति के लोगों के साथ क्रूरता या दुष्कर्म करने वालों को बिना कोई कारण बताये आरोपी को जेल भेजने का प्रावधान फिर हो गया | गैर जमानती धाराएँ लागू हो गई | ऐसे मामले की सुनवाई के लिये जिला स्तर पर अलग न्यायालय बनाया गया | सवर्णों का कहना है कि इन जातियों को सरकार ने विशेषाधिकार वर्ग का दर्जा दे दिया है | उनकी नजर में यह लोकतंत्र की बुनियादी सिद्धान्त के प्रतिकूल है | विशेषाधिकार युक्त तृतीय श्रेणी के नागरिकों को सरकार द्वारा राजनीतिक आरक्षण भी प्राप्त है | लोकसभा एवं विधानसभा के बहुत सारे सीट इनके लिये आरक्षित रहते हैं | इन सीटों पर दूसरी जाति के उम्मीदवार नहीं खड़े हो सकते हैं | सवर्णों का कहना है कि इन सीटों के लिये हमलोगों से बलात मतदान करवाया जाता है | यह कैसा विधान है कि वोट देने के लिये हम वैध नागरिक हैं मगर उम्मीदवारी नहीं दे सकते | यह हमारे मौलिक अधिकार का हनन है | हम क्यों वोट डाले इन सीटों के लिये चुनाव में |

जरा इस पर हमें विचार करना चाहिये कि सुन्दर रहन-सहन एवं विचार वाले सवर्ण आज इतना उग्र क्यों हो रहे हैं | पहले जमाने में कार्यों का बँटवारा जातियों के पेशे से जुड़ा था | गाँव में सभी जाति के लोग मवेशी पालते थे दूध की कमी नही रहती थी | मवेशियों के मर जाने पर एक विशेष जाति के लोग उस शव को उठाकर ले जाते थे और गाँव के बाहर एक निर्धारित स्थान पर शव को दफनाया जाता था | आज मृत मवेशियों को उठाने वाला कोई नहीं है | यह एक गम्भीर कारण है जो लोगों को मवेशी नहीं पालने के लिये विवश कर दिया | मवेशी पालन एक गम्भीर समस्या हो गई | सवर्णों को खुद इस काम को अन्जाम देना पड़ता है वो भी अपनी ही जमीन पर | मृत मवेशियों के शव को दफनाने के लिये जो जमीन निर्धारित थी उस पर सरकार द्वारा दूसरे उपयोग में लाया जा रहा है या उस पर इंदिरा आवास बन गया है | गाँव में मवेशी पालन एक गम्भीर समस्या हो गई है | इस तरह के और भी कार्य प्रभावित हो गये हैं | इस प्रथा में कुछ खामियाँ थी | ऐसे जाति के लोगों की सामाजिक मान्यता कम थी मगर आज वे भी खुद मवेशी नहीं पाल सकते हैं | ये समस्या उनके साथ भी आती है | सवर्णों का कहना है कि सामाजिकमान्यता सबको मिलनी चाहिये इसके लिये समाज एवं सरकार के साथ राजनीतिक दलों को भी एकजुट होकर प्रयास करना चाहिये |

खेती भी आज जातीय समस्याओं से प्रभावित है | मवेशियों के गोबर से खाद बना कर लोग खेतों में डालते थे वो बन्द हो गये | मशीनों का उपयोग कर खेती तो कर लिया जाता है लेकिन अनाज को बाहर से घर के अन्दर रखने के लिये आदमी नहीं मिलते हैं | पहले गाँव में रहने वाले हर जाति के लोगों का हर काम आसानी से हो जाता था मगर आज अपने आप पर निर्भर रहना पड़ता है | बहुत सारे ऐसे कार्य हैं जिसके लिये मशीन उपयोगी नहीं होता है | गाँव में ज्यादा जमीन जोतने वालों की संख्या कम होती है | ज्यादे लोग कम जमीन जोतने वाले होते हैं | वे उतने सक्षम नहीं होते कि हर काम के लिये मशीन का उपयोग करें | शहर के लोगों को इन सब समस्याओं से लगभग नहीं ही जूझना पड़ता है लेकिन गाँव के लोग काफी प्रभावित हैं | कृषि क्षेत्र का हर काम औसतन घट गया है | सरकार इन छोटी-छोटी मगर अति आवश्यक चीजों पर ध्यान नहीं देती है | सवर्ण किसी भी जाति के लोगों को बंधुआ मजदूर बनाकर रखने के पक्षधर नहीं है | सरकार की नीतियों में खामियाँ है | सरकार की नीतियों से कितने अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों का जीवन शैली ऊँचा उठा है इसका सही आँकड़ा नहीं दिया जा सकता है लेकिन इन जातियों में जातीय उन्माद चरम सीमा पर है जिसका खामियाजा समाज को भुगतना पड़ेगा |

जरूरतमंदों की जीवन शैली को ऊपर उठाने के प्रयास प्रशंसनीय है परन्तु दूसरे के जीवन शैली को न्यून करने का प्रयास निंदनीय है | अगर राजनीतिक दलों की मंशा सवर्णों को अनुसूचित जाति / जनजाति में तब्दील करना है तो यह देश में महान संकट उत्पन्न कर सकता है | इन मुद्दों पर सरकार क्या सोच रही है या करने जा रही है इसका खुलासा अभी नहीं हुआ है | जाति का मुद्दा और मुद्दे को अमल में लाने के लिये तदुनूकूल बनाये गये कानून सामाजिक व्यवस्था एवं सुरक्षा से जुड़ी होती है | सरकार को बड़ी ही सावधानी से नीति निर्धारित करनी होगी |


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