सुरक्षित समाज की नींव है कठोर फैसले

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सुरक्षित समाज की नींव है कठोर फैसले
सुरक्षित समाज की नींव है कठोर फैसले

अब नहीं!! अब हम नहीं सहेंगे  किसी भी बेटियों के साथ हो रही दरिंदगी को। आज हमारा समाज य़ह किस स्तर पर पहुंच गया है। कहीं अपनी नफरत मिटाने की भड़ास में तो कहीं अपनी भूख मिटाने की जुनून। य़ह कैसा समय आ गया है इंसान इंसान का ही भक्षण किए जा रहा है। 

आये दिन दरिंदगी अपने चरम सीमा पर पहुंच गयी है। समझ में नहीं आ रहा है कि ये हमारे समाज को क्या हो गया है, इतनी निर्ममता से एक दूसरे का अन्त किये जा रहे हैं। मानो ऐसा लगता है कि अब इस समाज में मनुष्य के भेस में मनुष्य नहीं है। हर जगह मानो भेड़िये घात लगाए बैठे हैं। कहीं भी मिल जाय शिकार तो झपट्टा मार कर ले जाएंगे।

य़ह ऐसे सामाजिक दरिन्दे है जो कहीं भी मिल सकते हैं। कभी अपने ही परिवार में, कभी अपने पड़ोस में, या कभी अपने ही समाज में। इनकी पहचान तो अब लगता है स्वयं भगवान भी नहीं कर पाते होंगे। एक पल यह हमारे शुभचिंतक बनते हैं दूसरे ही पल हमारे ही घरों की आबरू को तार तार करते हैं।इनसे तो न बच्चें सुरक्षित न ही बड़े। 

हम किसको दोष दें? किन कारणों से हमारा समाज  इतना दूषित हो गया है? हम अपने ही घरों में अपनों के बीच में सुरक्षित नहीं है। हम जन्म तो दे देते हैं लेकिन इनकी सुरक्षा  नहीं कर पा रहे हैं। ये बेबसी क्युं है? 

हम क्युं नहीं इनको एक सुरक्षित समाज दे पा रहे हैं? ऐसी कौन सी परस्थिति है जो समाज में रह रहे इंसान की प्रवृत्ति को इंसान भी नहीं बनने दे रही है। दिन पर दिन लोग क्रूरता की सीमा पार करते जा रहे हैं।

कहीं हम विकास के नाम पर अपने संस्कारों की बलि तो नहीं दे रहे हैं।जहां हमारा देश विकास की दिशा में ऊंचाईयों को छु रहा है वहीं दूसरी ओर लोगों की मानसिकता निम्न स्तर की होती जा रही है। आज समाज के एक छोड़ पर एक दूसरे के लिए अपनी जान तक कि परवाह नहीं करने वाले इंसान हैं। तो वहीं दूसरे छोर पर क्रुर आंखे बच्चें बुढ़े कमजोर असहाय जैसे लोगों पर घात लगाये बैठे हैं। आज हमारी स्थिति इतनी भयावह हो गयी है कि समाज में नवजात भी सुरक्षित नहीं है।

आखिर में अब लगता है सरकार को ऐसी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए या उन पीड़ित परिवारों को इन दुखों से बाहर आने में मदद करने के लिए, कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत है। एक बात जो बहुत ज़रूरी है कि सजा हमेशा अपराध से बड़ा होना चाहिए।  सजा देते वक़्त न उम्र न रुतबा और न ही हैसियत देखा जाये। आज के समय में जुर्म करने वाला व्यक्ति किसी के बहकावे में आ के जुर्म नहीं करता है। वह सिर्फ़ अपनी क्रुर मानसिकता का परिचय देता है। वह भले ही उम्र से नाबालिग हों लेकिन उनकी मानसिकता एक मंझे हुये अपराधी की भांति होती है। और वह सिर्फ समाज को दूषित करता है। ऐसी स्थिति में अगर सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया तो वह दिन दूर नहीं जब हर व्यक्ति अपने पर हुये अन्याय का इन्साफ खुद ही करने लगेंगे ।  ऐसे में तब तो न न्याय की आवश्यकता रहेगी और न न्यायाधीश की। ऐसी परिस्थिति में न इंसान बचेंगे न ही इन्सानियत।

अब सरकार को अपने कार्य प्रणाली में सुधार अथवा बदलाव लाने की आवश्यकता है। तब ही हमारे समाज के बच्चे बड़े बेटियाँ अथवा हर वह व्यक्ति जो अपने आप को असुरक्षित अनुभव करते हैं।वह सुरक्षित हो पाएंगे । और हम समाज में अपनत्व को कायम रख पाएंगे। असली विकास तब ही हो सकता है जब हम एक अपराध मुक्त समाज की स्थापना कर पाएंगे। और हर वह व्यक्ति चाहे वह गरीब हो अथवा अमीर निर्बल हो अथवा ताकतवर अपने आप को सुरक्षित महसूस करेगा। असली विकास उसी को कहेंगे या मानेंगे।
 

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