वर्तमान में शिक्षा का स्तर

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वर्तमान में शिक्षा का स्तर
वर्तमान में शिक्षा का स्तर

गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरा।
गुरु साक्षात परम ब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः।।

आज हम सब इस दोहे और उसके अर्थ को पूरी तरह से भूला दिया है। शिक्षक और शिक्षा दोनों का महत्व मतलब तक ही सीमित होकर रह गया है। एक समय था जब शिक्षा ही सबकुछ हुआ करता था। उस जमाने में गुरू का स्थान सर्वोपरी था गुरू के मुंह से निकला हर बात बच्चे अथवा उनके परिजन के लिए अंतिम निर्णय हुआ करता था। अगर कभी गुरुजी ने किसी को सजा दे दिया तो कोई उनकी कही बात का खंडन नहीं किया करते थे। वो समय कुछ ऐसा था। लेकिन आज समय पूर्ण रूप से बदल चुका है। आज एक शिक्षक ही दूसरे शिक्षक को नहीं समझ पाते हैं। जब शिक्षक की बात चली तो एक वाक्या मुझे याद आया।

कुछ समय पहले मेरी बेटी ने कहा “मैं स्कूल नहीं जाऊँगी”। 

मैंने आश्चर्य से पूछा “क्युं”? 

उसने कहा “आज मेरे साइंस के टीचर ने सबके सामने मुझे एक थप्पड़ मारा मैं स्कूल नहीं जाउंगी।” उसे इस थप्पड़ में अपनी बेइज्जती लगी। 

मैंने कारण पूछा तो उसने अपनी कोई गलती न होने की बात कही। मैंने नजरअंदाज कर दिया स्कूल है तो ऐसी बातें होती है। 
तब उसने अपने पापा को यही बात कही। 

तब मुझे बहुत आश्चर्य हुआ जब मैंने ये सुना कि उसके पापा ने बेटी के प्रिंसिपल से इस बात की शिकायत की। मुझे इतना आश्चर्य नहीं होता अगर ये खुद एक प्रिंसिपल नहीं होते। आप खुद एक शिक्षक हैं। आप बच्चों की मनः स्थिति को अच्छी तरह से समझते हैं। तब आपने ऐसा किया………. 

इन्हीं बातों से पता चलता है कि आज हमारे समाज में शिक्षकों की क्या स्थिति है। वे बार बार बच्चों के हर व्यवहार पर उसके परिजनों से क्युं शिकायत करते हैं। क्यूंकि हमने ही शिक्षकों के लिए एक दायरा सीमित कर दिया है। पहले की तरह हम गुरुजनों पर वो विश्वास ही नहीं रख पातें हैं। जिनकी शिक्षक और छात्रों को आवश्यकता होती है। हम हमेशा उन पर शक करते हैं उनके कार्य शैली पर सवालिया निशान लगाते हैं। ऐसे में हम अपने बच्चों के ही जीवन के साथ खिलवाड़ करते हैं। 

जब शिक्षा की बात आयी है तो बिहार के शिक्षा अथवा शिक्षकों के बारे में न लिखूं तो शिक्षक दिवस पूरी ही नहीं हो सकती है। कहने के लिए शिक्षा के मामले में बिहार सबसे पीछे है। यहां पर तकरीबन 50% लोग भी शिक्षित नहीं है। यहां सरकारी शिक्षा व्यवस्था बहुत ही कमजोर है। आज भी आधे से अधिक शिक्षक को जमीनी स्तर पर भी शिक्षा का ज्ञान नहीं है। जो किसी न किसी गलत तरीके से ही शिक्षक बने हैं। शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षकों की स्थिति भी दयनीय है। शिक्षकों को शिक्षक तो बना देते हैं लेकिन उनको जितना मान सम्मान मिलना चाहिए उतना मिलता नहीं है। जिस का खामियाजा छात्रों को उठाना पड़ता है। जिसके कारण देश दुनिया की आध्यात्मिक स्थिति कमजोर हो रही है। 

वहीं यदि निजी विद्यालयों की हालत देखें तो यहां शिक्षकों से अत्यधिक काम लेते हैं और बदले में उतना पैसा और सुविधाएं भी नहीं देते हैं। जिस कारण यहां पर भी शिक्षक, शिक्षा को कमाई का जरिया बना लेते हैं। विद्यालय में सही से पढ़ाते नहीं और बाहर ट्यूशन पढ़ाके अपनी कमाई करते हैं। निम्न वर्ग के लोगों को जिसका खामियाज़ा भुगतना पड़ रहा है। सरकार या शिक्षकों को इस बात से कोई मतलब नहीं कि बच्चों का मानसिक विकास हो रही है कि नहीं। वे बस अपनी ड्युटी भर पूरा करते हैं। 

ख़ैर यह तो हमारे समाज अथवा शिक्षा व्यवस्था की त्रुटियाँ है। जहां शिक्षा की ऐसी व्यवस्था है वहीं “सुपर 30 (आनंद इंस्टीट्यूट)” जैसे शिल्पकार भी है जो हर साल हमारे देश को कई आई आई टी इंजीनियर देते हैं। बिहार ही एक ऐसा राज्य है जहां हर साल सबसे अधिक “आई एस ऑफिसर” बनते हैं। इस शिक्षा व्यवस्था पर। 

बाकी राज्यों की तरह यदि बिहार सरकार भी शिक्षा के क्षेत्र में थोड़ी सी गम्भीरता बरते तो हमें पूर्ण विश्वास है कि आने वाले समय में शिक्षा के क्षेत्र में बिहार का नाम सबसे ऊपर गिना जाएगा।


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